: जीवन जीना, जीवन को जीतना, भेद कितना, मुनि श्री निरंजन सागर जी
Thu, Feb 16, 2023
जीवन जीना, जीवन को जीतना, भेद कितना, मुनि श्री निरंजन सागर जी
कुंडलपुर ।प्रत्येक प्राणी जन्म को प्राप्त होता है और मरण को भी। परंतु जन्म से मृत्यु की यात्रा को सफल हर कोई नहीं बना पाता। क्यों नहीं बना पाता? यह प्रश्न खड़ा होता है ।जन्म तो सभी प्राणियों ने लिया है। परंतु जन्म लेकर उन्होंने क्या किया ।यह बड़ा महत्वपूर्ण बिंदु है ।हम हमारे जीवन में कई कार्य करते हैं उन सभी कार्यों को करते समय कभी अंदर से यह आवाज आती है कि मैं यह कार्य क्यों कर रहा हूं ।यह अंदर से जो क्यों (?)नामक प्रश्न है.। यही जीवन विज्ञान का आधार है ।जन्म से लेकर मरण तक की यात्रा का चक्र अनवरत चल रहा है ।84लाख योनियों हैं। और इन योनियों को पाकर हमने क्या किया ।साइंस ऑफ लिविंग अर्थात जीवन विज्ञान को जिसने समझ लिया उसने जीवन का रहस्य समझ लिया ।आज अच्छे-अच्छे दार्शनिकों को आप पढ़ते हैं ,सुनते हैं ,देखते हैं ।उन दार्शनिकों के विचार भी बड़े अजीब से है। एक दार्शनिक ने यहां तक कहा कि लाइफ इज प्वांटलेस अर्थात जीवन शून्य है। जीवन आखिरकार है क्या? और जीवन की सफलता का मापदंड क्या है ?यह कुछ ऐसे सनातन प्रश्न है जिनकी खोज युगों से चल रही है ,और खोजकर्ता अपने हिसाब से इनके उत्तर खोज कर अपनी खोज को सफल बनाने पर जुटे हैं। जीवन को आचार्यों ने बहुत सहज शैली में परिभाषित किया है। जिसका भी अर्थात मन वन अर्थात जंगल में भी लग जाए वह जीवन है ।इस जीवन की सफलता का मापदंड भी आचार्यों ने स्पष्ट दिया है ।अपने आत्म तत्व की उपलब्धी प्राप्ति ही सफल जीवन का मापदंड है ।जिस प्राणी को किसी भी वस्तु से ना राग है, ना द्वेष है और ना ही मोह है। ऐसे प्राणी का जीवन ही वाकई में जीवन है ।वरना तो संसारी प्राणी यहां वहां अपना मन लगाता रहता है ।इस मन के रंजन में ही प्राणी ने अपने अमूल्य जीवन को लगा रखा है ।इसी मनोरंजन के कारण ही आज तक उसने अपने में निरंजन तत्व की अलख नहीं जगा पाया है ।इस निज निरंजन आत्म तत्व की प्राप्ति में सबसे बड़ा बाधक तत्व है संसार से प्रीति ।यह संसार से प्रीति जिस दिन संसार से भीति में परिवर्तित हो जाएगी ।उस दिन आपको अपने आप इस जीवन का रहस्य समझने में आने लगेगा ।दर्शन कारों की सोच जहां विराम को प्राप्त होती है वहां पर जैनाचार्यों की सोच प्रारंभ होती है ।इतना सूक्ष्म विवेचन ,इतना गहरा चिंतन अन्य कहीं नहीं भी देखने सुनने और पढ़ने को नहीं मिलता। हम सभी का परम आवश्यक कर्तव्य है कि पूर्वाचार्यों की वाणी को पढ़ें, समझे ,जाने और यथाशक्ति अपने जीवन में उतारने का प्रयास करें। जीवन को मात्र जिए ही नहीं अपितु जीतने का भी प्रयास करें। जिसने जीने और जीतने के भेद को समझ लिया उसका जीवन शीघ्र ही सार्थक अर्थ तक पहुंच जाता है ।वरना तो यह जन्म मरण का चक्र कभी समाप्त होने वाला नहीं है। कितने पुण्य और पुरुषार्थ से यह मनुष्य योनि मिली है। इसकी सार्थकता नर से नारायण बनने में ही है ।ना कि नर से नार की बनने में ,और ना ही नर से वानर (पशु) बनने में।
संकलन ----जयकुमार जैन जलज
: कुंडलपुर में आर्यिकारत्न श्री सोम्यमति माताजी ससंघ का मंगल प्रवेश
Wed, Feb 15, 2023
कुंडलपुर में आर्यिकारत्न श्री सोम्यमति माताजी ससंघ का मंगल प्रवेशकुंडलपुर। सुप्रसिद्ध सिद्धक्षेत्र कुंडलपुर में संत शिरोमणि आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज की प्रभावक शिष्या आर्यिकारत्न श्री सोम्यमति माताजी ससंघ 8 माताजी का भव्य मंगल प्रवेश हुआ। आर्यिका संघ की गाजे-बाजे के साथ अगवानी की गई । आर्यिका संघ बरोदा ,हटा, बरखेड़ा होते हुए कुंडलपुर पहुंचा।
: तोल मोल कर बोल, ऐसे बोल का होता मोल,मुनि श्री निरंजन सागर जी
Tue, Feb 14, 2023
*तोल मोल कर बोल, ऐसे बोल का होता मोल**मुनि श्री निरंजन सागर जी*कुंडलपुर ।साइंस ऑफ वर्ड अर्थात शब्द विज्ञान एक ऐसा विज्ञान है, जो अपने आपमें अनोखा रहस्यमय विज्ञान है ।पावर आफ वर्ड अर्थ शब्द की अपनी शक्ति होती है ।इंपैक्ट ऑफ़ वर्ड अर्थात शब्द का अपना प्रभाव होता है ।फोर्स आफ वर्ड अर्थात शब्द की अपनी गति होती है। शब्द विज्ञान के कुछ आधारभूत बिंदु हैं जैसे- शब्द का प्रयोग कब करना कैसे करना कितना करना और क्यों करना। शब्दों का प्रयोग करते समय जिसने इन आधारभूत बिंदुओं का ध्यान रखा है उसके शब्द, शब्द शक्ति को प्राप्त होकर अपना विशेष प्रभाव डालते हैं। जिससे सामान्य शब्द भी विशेषता को प्राप्त हो जाते हैं। शब्द विज्ञान में शब्द का उच्चारण भी अपना विशिष्ट स्थान रखता है। जैसे स्वजन अर्थात संबंधी और श्वजन अर्थात कुत्ता ।कम्युनिकेशन ऑफ वर्ड अर्थात शब्दों का संप्रेषण भी शब्द विज्ञान का महत्वपूर्ण अंग है। जैसे प्राचार्य ने कहा "कल विद्यालय बंद रखा जाएगा" और चपरासी ने सूचना पटल पर लिख दिया "कल विद्यालय बंन्दर खा जाएगा "उच्चारण की स्पष्टता और व्यवस्थित संप्रेषण आपके व्यक्तित्व में भी निखार लाता है। शब्द की भी अपनी गति होती है। शब्द से अर्थ और अर्थ से ज्ञान यह शब्द की गति होती है ।शब्द के अर्थ को जाने बिना वह शब्द हमारे लिए ज्ञान रूप में परिणत नहीं हो पाएगा। फोर्स आफ वर्ड अर्थ शब्द की गति ।वर्ड टु मीनिंग एंड मीनिंग टू नॉलेज ।जैसे मान लीजिए यहां पर कोई कन्नड़ भाषा भाषी व्यक्ति आ जाए और कुछ कहे ।उसके मुख से निकलने वाले शब्द आपको सुनाई बस देते हैं परंतु समझ में नहीं आते हैं ।क्यों? क्योंकि आपको उन शब्दों का अर्थ नहीं पता है ।जिससे उन शब्दों का ज्ञान आपको नहीं हो पा रहा है। ऐसे अर्थ विहीन शब्द गतिमान ना होकर गति रहित ही रहते हैं। वही आपको आपकी भाषा में कुछ कहे तो आप तुरंत समझ जाते हैं। ऐसा क्यों ?क्योंकि आप उन शब्दों के अर्थ से भलीभांति परिचित हैं ।जिससे वह आपके लिए ज्ञान कराने में सहयोगी रहते हैं ।कहा भी है "शब्द ब्राह्मणि निष्णात पर ब्रह्माधिगच्छति" अर्थात शब्द ब्रह्म में पारंगत व्यक्ति पर ब्रह्म की प्राप्ति कर सकता है ।यह सिद्धांत इस बात की सूचना देता है कि साधक को पहले शब्द शक्ति और उसकी मर्यादा तथा भाव का ज्ञान आवश्यक है ।यदि उसे शब्द के वाच्यार्थ, भावार्थ और तात्पर्यार्थ की प्रक्रिया का बोध नहीं है तो वह भटक सकता है। वस्तुतः शब्द भावों के ढोने का एक लंगड़ा साधन है ।जब तक संकेत ग्रहण ना हो तब तक उसकी कोई उपयोगिता ही नहीं है ।एक ही शब्द संकेत भेद से भिन्न भिन्न अर्थों का वाचक होता है ।इसलिए दर्शन शास्त्रों में एक पक्ष यह भी उपलब्ध होता है कि शब्द केवल वक्ता की विवक्षा को सूचित करते हैं ।पदार्थ की वाचक नहीं है ।शब्दों के अनेक अर्थ होते हैं। प्रसंग के अनुसार निकाले गए शब्दों के अर्थ ही सही ज्ञान कराते हैं ।वही शब्द शस्त्र है, वही शब्द शास्त्र है ।वही शब्द बाण है वही शब्द वीणा है ।आज विश्व में जितना विनाश हो रहा है उसका मुख्य कारण शब्द विज्ञान की अनभिज्ञता ही है ।शब्दों का सही संयोग, सही अर्थ के साथ ,सही दिशा में करना हम सबका ध्येय होना चाहिए।संकलन ---जयकुमार जैन जलज हटा