: नरसिंहपुर, तीन दिवसीय योग यज्ञ प्रवचन व वेदकथा कल से
Sun, Feb 26, 2023
तीन दिवसीय योग यज्ञ प्रवचन व वेदकथा कल सेनरसिंहपुर। महर्षि दयानंद सरस्वती की 199वीं जयंती पर पंडित राममनोहर तिवारी आर्य समाज मंदिर परिसर में विविध कार्यक्रम 27 फरवरी से प्रारंभ होंगे। आर्य समाज आयोजन समिति ने बताया कि तीन दिवसीय कार्यक्रम के तहत 27, 28 फरवरी एवं 1 मार्च को अनेक कार्यक्रम आयोजित किए गए हैं। जिसमें योग, यज्ञ, प्रवचन एवं वेद कथा प्रमुख हैं। कार्यक्रम के तहत प्रतिदिन प्रातः 6:15 से 7:30 बजे तक योग, प्रातः 8:30 से 10:30 तक यज्ञ हवन, दोपहर में 2 से 5:30 बजे तक वेदकथा सत्संग एवं प्रवचन होंगे। तीन दिवसीय योग यज्ञ प्रवचन एवं वेदकथा में देश के अनेक विद्वान और आर्य समाज के पदाधिकारी भाग लेंगे जिसमें मुख्य रूप से नरेशदत्त आर्य विजनोर, नरेन्द्र दत्त विजनोर, धीरेन्द्र पांडे जबलपुर, सुर्दशन आर्य भोपाल, रामरतन लोधी जबलपुर, दीप्ति आर्या देहरादून के अलावा देश के कई हिस्सों से अतिथि और प्रमुख वक्ताओं का आगमन होगा। आयोजन समिति ने सभी वर्ग के लोगों से सहभागिता की अपील की है।
: कुंडलपुर, महत्वपूर्ण क्या है? बड़ा बनना या बड़प्पन आना,मुनि श्री निरंजन सागर जी महाराज
Fri, Feb 24, 2023
*महत्वपूर्ण क्या है? बड़ा बनना या बड़प्पन आना**मुनि श्री निरंजन सागर जी महाराज*कुंडलपुर ।"साइंस ऑफ लिविंग" इस सत्र में हम एक ऐसे विषय को छूने जा रहे हैं, जिसको लगभग हर व्यक्ति कहीं ना कहीं अपने जीवन में महसूस करता है ।जो भी व्यक्ति सत्ता में आता है पद पर आता है वह अपनी सत्तागत शक्तियों से अपने आप को बहुत बड़ा समझने लगता है ।यहां तक की अपने सामने किसी को कुछ भी नहीं समझता है ।आचार्य कहते हैं "प्रत्येक द्रव्य में अस्तित्व गुण विद्यमान है "अर्थात प्रत्येक वस्तु का अपना अस्तित्व है ।जो उस अस्तित्व को स्वीकार नहीं करता यह उसका अज्ञान है ।ज्ञानी सभी का अस्तित्व जानता है और उसे स्वीकार भी करता है ।वह योग्य को योग्य के रूप में और अयोग्य को अयोग्य के रूप में स्वीकार करता है ।बड़ा बनने का अवसर जब छोटो ने दिया तब फिर उनकी उपेक्षा क्यों ?उपेक्षा करना ना करना यह कुछ ऐसे बिंदु हैं जो आपकी नकारात्मक सोच को विचार को प्रस्तुत करती है । अस्ति अर्थात सत (है )आचार्य कहते हैं "सत दृव्य लक्षणम" बगैर लक्षण को स्वीकार किए हम लक्ष्य तक कैसे पहुंच सकते हैं ।आपके शरीर के छोटे-छोटे अवयव बड़े काम के हैं। आंख ,नाक ,कान आदि यह छोटे होकर भी अपनी उपयोगिता रखते हैं ।इसलिए छोटो का ध्यान रखना चाहिए ।वही राजा श्रेष्ठ माना जाता है जिसकी प्रजा संतुष्ट है ।छोटो की रक्षा करो क्योंकि छोटो के होने पर ही आप बड़े कहलाओगे ।बिना प्रजा के राजा कभी शोभायमान नहीं होता ।जिस प्रकार शरीर का एक-एक अवयव कार्यकारी है उसका महत्व है उसकी उपयोगिता है, उसी प्रकार संगठन का एक एक व्यक्ति महत्वपूर्ण है कार्यकारी है। विनय और वात्सल्य का भी अनोखा संयोग है ।बड़े छोटों के प्रति वात्सल्य भाव रखें और छोटे भी बड़ों के प्रति विनय भाव रखें। हम विनय चाहते हैं तो वात्सल्य देना प्रारंभ करें ।और वात्सल्य चाहती हैं तो विनय करना प्रारंभ करें ।गाय का अपने बछड़े में जो प्रेम रहता है ऐसा उत्कृष्ट प्रेम अन्यत्र देखने को नहीं मिलता है। यह उत्कृष्ट प्रेम ही वात्सल्य है। आदर का उत्कृष्ट रूप ही विनय है। विनय के बिना वात्सल और वात्सल्य के बिना विनय नहीं रह सकते ।यह पूरक संबंध है ।जिसे अविनाभाव संबंध कहते हैं ।पद की गरिमा का ख्याल रखकर ही कार्य करना चाहिए ।यही बड़प्पन है। यहां पर आपका प्रश्न उठ सकता है कि क्या काम भी बड़ा छोटा होता है ?आप लोग ही तो कहते हो "किसी काम को छोटा मत समझो "यहां पर काम का अर्थ व्यवहार से है अर्थात बड़े बन कर बड़ो जैसा व्यवहार होना चाहिए। स्वामित्व बुद्धि ,कर्तव्य बुद्धि अर्थात कर्त्ता बुद्धि को छोड़कर कर्तव्य बुद्धि होना चाहिए ।हमारा कर्तव्य है हमारा सौभाग्य है जो हमें यह कार्य यह पद मिला है। एक प्रसिद्ध दोहा है "बड़ा हुआ तो क्या हुआ जैसे पेड़ खजूर पंछी को छाया नहीं फल लागे अति दूर" यह उदाहरण मात्र इस प्रसंग को समझने के लिए है। खजूर के भी अपने गुणधर्म है परंतु प्रसंग के अनुसार जो भूखा प्यासा राहगीर है उसके लिए उसका कोई महत्व नहीं है। इसलिए हम एक ऐसी उपजाऊ भूमि बने जिस पर हर तरह के वृक्ष लग सके। जो हर तरह के राहगीर को संतुष्ट कर सके ।हमारी हृदय की विशालता हमारे चिंतन की विराटता ही हमें बड़ा बनाने का मूल आधार है ।हम हमारे कर्तव्यों के माध्यम से जीवन की उस ऊंचाई को छुये जिसके बाद हमें कभी पलट कर देखना ना पड़े ।बड़ों की यही रीति है कि मुख से बोले बिना ही व्यवहार से छोटों को विनय सिखा देते हैं।जयकुमार जैन जलज हटा
: जीवन को गति नहीं, प्रगति देना है,मुनि श्री निरंजन सागर जी महाराज
Wed, Feb 22, 2023
*जीवन को गति नहीं, प्रगति देना है** मुनि श्री निरंजन सागर जी महाराज*कुंडलपुर ।"साइंस ऑफ लिविंग" का आनंद वही ले सकता है जो इस जीवन विज्ञान के रहस्य को समझने के लिए कमर कस कर बैठा हो। चलते रहना गति है और आगे बढ़ना प्रगति है ।जैसे कोल्हू का बैल चलता रहता है परंतु आगे नहीं बढ़ता है उसे गतिमान ही कहा जा सकता है, प्रगतिमान नहीं कहा जा सकता ।कोई भी जीव भ्रमण करें परंतु अपने लक्ष्य तक ना पहुंचे तो उसका यह गति करना ,घूमना ,शक्ति व समय दोनों की बर्बादी है। वह जीव गति तो कर रहा है परंतु प्रगति नहीं कर रहा है ।अपने लक्ष्य की ओर बढ़ना ही प्रगति है। केवल भ्रमण करना प्रगति नहीं ।इसी प्रकार कोई जीव चारों गतियों में खूब घूमे परंतु अपने लक्ष्य सिद्धि की ओर ना बड़े तो उसका यह घूमना भव भ्रमण है ,प्रगति करना नहीं है। संसार के सभी प्राणी शांति चाहते हैं ,सुख चाहते हैं ,किसी भी प्राणी की मांग अशांति की दुख की नहीं है ,अर्थात जो संसार भ्रमण करावे वह गति है और जो संसार से निवारण करावे वह प्रगति है। इससे यह स्पष्ट है कि सभी प्राणियों का लक्ष्य सुख, शांति प्राप्त करना है ।दुख अशांति से छुटकारा पाना है। वस्तुतः जो सभी प्राणियों को हमेशा प्रिय है वहीं लक्ष्य है।सभी प्राणियों को सुख अभीष्ट है ,पसंद है ।इसलिए सभी प्राणी सुख पाने के लिए निरंतर प्रयत्नशील हैं। उनका सारा कार्यकलाप सुख।पाने के लिए है ।वे जो भी प्रवृति करते हैं उसके पीछे उनका लक्ष्य सुख पाना ही है ।यदि वर्तमान में सुख विद्यमान होता अर्थात सुख का अभाव ना होता तो सुख पाने की कामना ही उत्पन्न नहीं होती। पाने की इच्छा उसी की होती है जो अभी प्राप्त नहीं है ।आचार्य कहते हैं "दुख मेव वा"अर्थात संसार दुख रूप ही है ।कहते भी हैं "कहूँ ना सुख संसार में सब जग देखो छान "ना तो इस संसार में सुख है और ना तो इस संसार में कोई सुखी है ।फिर भी संसारी प्राणी उस सांसारिक सुखों की पूर्ति में दिन-रात लगा है ।बारह भावनाओं में आप लोग पढ़ते हैं "जो संसार विषय सुख होता तीर्थंकर क्यों त्यागै?। "तीर्थंकरों ने भी अपने आत्मिक सुख के लिए, वास्तविक सुख के लिए ,इस संसार का त्याग कर दिया तो आप और हम किस खेत की फसल है ।त्याग से ही लक्ष्य की प्राप्ति ,सुख की प्राप्ति होती है। अतः त्याग में ही प्रगति है प्रवृत्ति में नहीं। भोगों को आचार्यों ने एक असाध्य रोग कहा है। भोग प्रवृत्ति के द्वारा आज तक कोई भी अपने लक्ष्य को साध्य को नहीं पा सका है ।यह तो ऐसा है जैसे क्षितिज अर्थात जहां धरती आकाश मिलते दिखाई देते हैं वहां तक पहुंचने के लिए कोई गति करता है चलता है वह चाहे कितना भी चले उससे क्षितिज की दूरी मैं कमी नहीं आती ,वह दूरी ज्यों की त्यों रहती है। उसे अपने लक्ष्य की ओर आगे बढ़ने का भ्रम ही होता है ,आगे नहीं बढ़ता है। अतः उसका चलना प्रगति करना नहीं है ।मुक्त होने के लिए स्व( अपने आत्म तत्व) की ओर बढ़ना होता है। स्व की ओर गति तभी संभव है जब पर (संसार) की ओर गति करना बंद करें, पर से विमुख हो। अपने आत्म तत्व की ओर गति करना ही लक्ष्य की ओर बढ़ना है, प्रगति करना है ।हम सभी को अपने गतिमान जीवन को प्रगति मान जीवन बनाना है ताकि हम सभी अपने लक्ष्य को प्राप्त हो।
जयकुमार जैन जलज