: गाडरवारा ,ककराघाट में माँ रेवा की महाआरती सम्पन्न
Mon, Feb 20, 2023
माँ रेवा की महाआरती सम्पन्नगाडरवारा। छै वर्ष पूर्व इसी फरवरी माह से आरंभ माँ रेवा की 74 वीं महाआरती आज ककराघाट के दक्षिण तट पर माँ रेवा के अनेक भक्तों के मध्य सम्पन्न हुई,पं विश्वनाथ दुबे के द्वारा विधिविधान से माँ की महाआरती सम्पन्न करायी,पुण्य सलिला माँ रेवा की आरती विगत 6 वर्षों से प्रत्येक अमावस्या को अनवरत जारी है कोरोना काल,ठंडी गर्मी एवं बरसात के विपरीत मौसम में भी महाआरती आरम्भ रहती है तथा माँ के भक्त अपनी उपस्थिति देते हैं आज की आरती में बच्चों,युवाओं,माताओं एवं महानुभावों ने अपनी उपस्थिति प्रदान कर माँ की आराधना की।
: सिलौंडी में मुनि महाराज द्वय का भव्य स्वागत
Fri, Feb 17, 2023
अनिल जैन सिहोरा
सिलौंडी में मुनि महाराज द्वय का भव्य स्वागतसिलौंडी : आज कछार गांव बड़ा से विहार कर सिलौंडी में पूजनीय मुनि द्वय का आगमन हुआ । कछार गाँव बड़ा से सिलौंडी तक भक्तों ने मुनि द्वय के साथ पैदल यात्रा करते हुए सिलौंडी बरिया मोड़ पर भव्य आगवानी की है । मुनि श्री अर्हम योग प्रणेता प्रणम्य सागर जी महाराज एवं वात्सल्य मूर्ति मुनि श्री चन्द्र सागर महाराज का दूसरी बार सिलौंडी आगमन हुआ है ।पहली बार 2006 मे आचार्य श्री मुनि 108 श्री विद्यासागर महाराज जी के साथ आगमन हुआ था । आज पूरा सिलौंडी मुनि श्री के स्वागत में खड़ा था । ग्राम के जैन अजैन सभी लोगों ने भी अपने घर पर रंगोली लगाकर मुनि श्री का भव्य स्वागत किया है । मुनि श्री द्वय ने सिलौंडी के श्री पारस नाथ दिगम्बर जैन मंदिर एवं श्री 1008 चन्द्र प्रभु दिगम्बर जैन मंदिर के दर्शन किया है ।इस अवसर पर कुमहि सतधारा जैन समाज ने मुनि श्री को श्री फाल भेंट कर कुम्हि सतधारा आने का आग्रह किया है ।इस अवसर पर कछार गांव ,सिलौंडी ,पनागर खितौला के लोगों की उपस्थिति रही है ।
: शब्दों का खेल ,कभी मेल ,तो कभी बेमेल, मुनि श्री निरंजन सागर जी
Fri, Feb 17, 2023
शब्दों का खेल ,कभी मेल ,तो कभी बेमेल, मुनि श्री निरंजन सागर जीकुंडलपुर। आचार्यों ने हित ,मित और प्रिय शब्दों का प्रयोग करने को कहा है। हितकारी वचन अर्थात जो दूसरों के लिए और अपने लिए कल्याणकारी हो। जिसमें अपना वा दूसरों का स्वार्थ सधता हो, वे हितकारी वचन नहीं है। इसका अर्थ कल्याण है ना कि स्वार्थ। मितकारी वचन अर्थात संक्षिप्त ,सारगर्भित, सांकेतिक( टू द प्वाइंट)। यदि दो शब्द से काम चल जाए तो तीसरा शब्द बोलने की आवश्यकता नहीं है ।लोकोक्ति भी है कि "समझदार के लिए इशारा ही काफी है"। प्रिय कारी अर्थात अमृतमय सत्य। सामान्य रूप से कहने में यही आता है कि" सच कड़वा होता है।" एक जगह हमें पढ़ने को मिला कि सच केवल कड़वा ही नहीं होता सच अमृत के समान भी होता है। जिनके भीतर विष होता है उन्हें वह विषाक्त मालूम होता है ।पर वह होता अमृतमय है। जिस प्रकार ज्वर से संतृप्त पुरुष को कुछ भी खिलाएं पिलाएं उसे उसका स्वाद कड़वा ही लगता है ।आचार्यों ने स्पष्ट कहा है" सत्यम अपि विपदे" अर्थात ऐसा शब्द जिसमें दूसरों को क्षति पहुंचती हो वह सत्य भी असत्य की श्रेणी में है ।यह मात्र जैन दर्शन में पढ़ने, देखने और जानने को मिलता है। पूरी दुनिया सत्य के बारे में यही मानती है कि जैसा देखा, सुना ,जाना वैसे का वैसा कह दो इसी का नाम सत्य है। आचार्य कहते हैं सत्य वद्- प्रियंवद् अप्रियं न वद्। प्रिय असत्यं अपि न वद्। अप्रियं सत्य कदापि ना वद्। इस प्रसंग को एक उदाहरण से समझते हैं ।एक राजा को अपना चित्र बनवाना था। इसके लिए बहुत सारे कलाकार बुलवाएं। राजा का चित्र तो सुंदर ही बनना चाहिए। पर राजा के साथ मुश्किल यह थी कि उनकी एक आंख नहीं थी ।अब राजा का सुंदर चित्र बनाना है। अगर चित्र सच्चा बनाते हैं तो सुंदर नहीं बनेगा क्योंकि एक आंख नहीं बनेगी ।एक चित्रकार ने कहा इससे कोई मतलब नहीं जो सच है वही बनाएंगे अपन तो। उसने राजा की एक आंख नहीं बनाई बाकी तो सब सुंदर था। राजा को वह चित्र पसंद नहीं आया। दूसरे कलाकार ने सोचा अरे वाह सुंदर बनाना चाहिए। सच से क्या मतलब उसने राजा की दोनों आंखें एकदम दुरुस्त एकदम बढ़िया बना दी ।उसे देखकर राजा ने कहा यह चित्र झूठा है ।सुंदर तो है ।यह प्रिय मालूम पड़ता है लेकिन झूठा है। पहले वाला अप्रिय मालूम पड़ रहा था वह सच्चा था। दोनों ही रिजेक्ट (अस्वीकृत )हो गए ।सच जो प्रिय है वह भी ठीक नहीं है और झूठ जो कि प्रिय है वह भी ठीक नहीं है ।तीसरे कलाकार ने चित्र बनाया राजा बहुत शूरवीर है बलवान है और तीरंदाज है ।वह हाथ में धनुष बाण लिए है और निशाना साध रहे हैं ।निशाना साधने पर एक आंख बंद रहती है। चित्र में इस प्रकार एक आंख बंद दिखाई गई ।वह चित्र पास हो गया ।क्योंकि वह सत्य भी है प्रिय भी है ।आप सब समझ रहे हैं इस बात को ।हमें सत्य भी और प्रिय भी किस तरह से इस बात का ध्यान रखना है। इस प्रकार अपन अगर थोड़ी सावधानी रखकर अपने वचनों का प्रयोग करें तो अपन अपने जीवन को बहुत ऊंचा उठा सकते हैं ।आपके वचन वाद विवाद का कारण न बने। बल्कि सही वचनों का प्रयोग वाद को पलटने की क्षमता रखता है। शब्दों का खेल ,कभी मेल, तो कभी बेमेल ।शब्द अर्थ बने अनर्थ ना हो तभी तो सार्थकता है ।नहीं तो वाद विवाद ।वाद विलोम रूप से कह रहा है वा---द, द---वा। शब्दों में प्राणदायक शक्ति भी होती है और प्राणहारक भी।संकलन-- जयकुमार जैन जलज