: लड़ना है तो भरत --बाहुबली की तरह लड़ना,मुनि श्री निरंजनसागर जी
Thu, Mar 2, 2023
लड़ना है तो भरत --बाहुबली की तरह लड़ना,मुनि श्री निरंजनसागर जीकुंडलपुर ।साइंस ऑफ लिविंग में आज हम एक ऐसा अनोखा विषय प्रस्तुत कर रहे है ।जिससे प्रायः कर हर व्यक्ति परिचित है। पर क्या उचित है क्या अनुचित है यह समझने का प्रयास हम सभी करेंगे। संपत्ति और स्वाभिमान को लेकर एक ऐसा महायुद्ध हुआ जिसका अपना ही इतिहास है। यूं तो रामायण और महाभारत आदि बड़े-बड़े ग्रंथ युद्ध और योद्धाओं के रण कौशल और वीरता के इतिहास से भरे पड़े हैं। पर आज हम जिस युद्ध की चर्चा करने जा रहे हैं वह युद्ध भी विशेष है और उसके योद्धा भी ।उस युद्ध की दर्शक थी दोनों पक्ष की सेना ।प्रश्न खड़ा होता है कि जब सेना दर्शक थी तो युद्ध हुआ किसमें ?इस प्रश्न का उत्तर मिला आचार्य जिनसेन स्वामी द्वारा लिखित ग्रंथराज आदिपुराण में। दोनों ही सेनाओं में जो मुख्य- मुख्य मंत्री आदि थे उन्होंने विचार विमर्श किया यह दोनों भाई आदि ब्रह्मा आदिनाथ भगवान के पुत्र थे। एक चक्रवर्ती सम्राट भरत है जिनके नाम पर इस देश का नाम भारत पड़ा और जिनके सामने पूरा विश्व नतमस्तक है ।अर्थात सम्राट भरत ने संपूर्ण पृथ्वी पर दिग्विजय प्राप्त की है। दूसरे हैं महाराज बाहुबली जिनमें यथा नाम तथा गुण है अर्थात महाराज बाहुबली के बाहुबल के आगे कोई भी नहीं टिक पाया ।दोनों चरम शरीरी है। इनके पराक्रम के आगे देवता भी नतमस्तक हैं। इन दोनों महावीरों की तो कुछ भी क्षति नहीं होगी ।केवल युद्ध के कारण से दोनों पक्षों के लोगों का ही मरण होगा ।जब इस बात का भरत और बाहुबली के समक्ष निवेदन किया तब दोनों वीर सम्राटों ने बड़े धैर्य के साथ विचार कर कहा कि हमारे वर्चस्व के संग्राम में किसी प्रकार की ना ही जनहानि हो और ना ही धन हानि। बस यहां हानि अगर होगी तो वह होगी अहंकार की मान की। एक ऐसा युद्ध हो जिसमें हम दोनों ही परस्पर में जय पराजय का निर्णय करें। धर्मयुद्ध की एक ऐसी संयोजना बनाई गई जिसमें जल युद्ध, दृष्टि युद्ध और मल्ल युद्ध ऐसे तीन युद्धो के माध्यम से निर्णय हो सके। तीनों ही युद्धों में छोटे भाई बाहुबली विजय श्री को प्राप्त हुए। चक्रवर्ती भरत के मान को गहरा धक्का लगा, और उन्होंने क्रोध के आवेग में अपना सुदर्शन चक्र बाहुबली के ऊपर चला दिया ।चूंकि देवोपनीत शस्त्र कुटुंब के लोगों पर कार्यकारी नहीं रहता है ।अतः वह चक्र भी बाहुबली की परिक्रमा कर शांत हो गया। भरत चक्रवर्ती के इस कृत्य को सभी ने निंदनीय कहा, और चहुंओर से बाहुबली की जय जयकार से वातावरण गुंजायमान हो गया ।उस समय एक ऐसा महान आश्चर्य कारी दृश्य सभी के देखने में आया जिसमें सभी दर्शकों की आंखें और ह्रदय भीग गये ।विजयश्री प्राप्त होने पर भी बाहुबली को घोर पश्चाताप हुआ। बाहुबली ने कहा बड़ा भाई पिता तुल्य होता है और मैं इतना निकृष्ट कैसे हो गया कि पिता तुल्य बड़े भाई पर इस नश्वर राजलक्ष्मी के लिए मैंने कितना बड़ा अपराध कर डाला ।मुझे क्षमा कर दीजिए। मैं इस वैभव का त्याग कर वैराग्य की ओर जा रहा हूं ।मैं इस राजलक्ष्मी का त्याग कर तपलक्ष्मी को अंगीकार करता हूं ।मैं दिगंबर जैनेश्वरी दीक्षा को स्वीकार करता हूं ।भरत महाराज ने कहा भाई तुमने नहीं मैंने दुष्टता का कार्य किया है ।छोटा भाई तो पुत्र के समान होता है। यह मुझसे बहुत बड़ा पाप हो गया है अनर्थ हो गया है भाई मुझे क्षमा कीजिए। दोनों भाई फूट-फूटकर एक दूसरे से क्षमा याचना कर रहे। दोनों भाई अपने आप को अपराधी कह रहे, पापी कह रहे हैं और भाई से भाई क्षमा प्रार्थना कर रहे हैं ।बाहुबली अपने संकल्प पर दृढ़ रहते हुए पुत्र महाबली को राज्य सौंपते हुए कह गए कि भरत महाराज की आज्ञा अनुसार राज्य शासन करना ।वे बड़े हैं ,महान है उनके मार्गदर्शन में ही कार्य करना ।इतना कह सभी से क्षमा याचना कर बाहुबली वन को चले गए ।यह प्रसंग बहुत मार्मिक शिक्षा देता है। बाहुबली तो वन को गए और हम थाने जाते हैं ,कोर्ट जाते हैं।भरत बाहुबली तो एक दूसरे से क्षमा याचना कर रहे थे, और हम एक दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप करते रहते हैं ।क्या कभी हमें हमारे जीवन में कभी ऐसे प्रसंग पर बैराग्य आया है, आत्म ग्लानि हुई, पश्चाताप हुआ, क्यों नहीं हुआ? प्रश्न का उत्तर आप सभी जानते हैं।
जयकुमार जैन जलज
: त्रय आचार्य संघों का कुंडलपुर में 3 मार्च को मंगल प्रवेश होगा
Wed, Mar 1, 2023
त्रय आचार्य संघों का कुंडलपुर में 3 मार्च को मंगल प्रवेश होगा
कुंडलपुर ।सुप्रसिद्ध सिद्धक्षेत्र कुंडलपुर में परम पूज्य गणाचार्य श्री विरागसागर जी महाराज के परम प्रभावक शिष्य पूज्य आचार्य श्री विभवसागर जी महाराज, आचार्य श्री विनम्रसागर जी महाराज, आचार्य श्री विहर्ष सागर जी महाराज का ससंघ( 50 पिच्छी) का मंगल प्रवेश कुंडलपुर की पावन धरा पर संभवत 3 मार्च को प्रातः 8:00 बजे होने जा रहा है। त्रय आचार्य संघ पथरिया विरागोदय महोत्सव सानंद संपन्न कर दमोह ,पटेरा होते हुए सिद्धक्षेत्र कुंडलपुर पूज्य बड़े बाबा के श्री चरणों में पधार रहा है। कुंडलपुर क्षेत्र कमेटी के अध्यक्ष चंद्रकुमार सराफ ने सभी धर्म श्रद्धालुओं से कुंडलपुर पधार कर धर्मलाभ लेने का आग्रह किया है।
: जो खुद को समझ पाते हैं वे ही खुदा बन पाते हैं,मुनि श्री निरंजनसागर जी महाराज
Mon, Feb 27, 2023
जो खुद को समझ पाते हैं वे ही खुदा बन पाते हैं,मुनि श्री निरंजनसागर जी महाराज
कुंडलपुर। सुप्रसिद्ध सिद्धक्षेत्र कुंडलपुर में मुनि श्री निरंजन सागर महाराज ने कहा सब का पता हमें पता है पर खुद का पता पता नहीं ।साइंस ऑफ लिविंग के सत्र में हम खुद को खोजने जा रहे हैं। यह प्रयास जिन्होंने पूर्ण कर लिया उन्होंने अनंत आनंद की प्राप्ति कर ली है। हम स्व और पर के भेद विज्ञान को समझने का प्रयास करें ।स्व अर्थात आत्म तत्व और पर अर्थात इस आत्म तत्वों से भिन्न जो भी दृश्यमान अदृश्य मान सत्व है सभी ।हम स्व की ओर ध्यान न देकर पर की ओर ध्यान देते हैं ,तो यह हमारी अज्ञानता है ।आचार्य कहते हैं उत्तमा स्व आत्म चिंता अर्थात अपनी आत्मा की चिंता करना उत्तम है श्रेष्ठ है ।इसे सही स्वार्थी कहां है (स्व+ अर्थी) जो अपने आत्म तत्व को ग्रहण करता है उसे स्वार्थी कहते हैं ।लौकिक जगत में स्वार्थी तो सभी हैं परंतु आध्यात्मिक जगत में स्वार्थी बनना सही मायने में स्वार्थी है। हम देहाती है (देह+ अति) जो देह पर अतिरिक्त ध्यान देवें वह देहाती ही तो है। यह बहुमूल्य नर पर्याप्त नारायण बनने का खुद से खुदा बनने का आत्मा से परमात्मा बनने का मार्ग प्रशस्त करने वाली पर्याय है ।जो व्यक्ति स्वयं चार कदम नहीं चल सकता वह दूसरों को क्या सहारा देगा। इसी प्रकार जो अपना आत्म कल्याण नहीं कर सकता वह दूसरों का या जगत का कल्याण क्या करेगा। इसलिए सर्वप्रथम अपने आत्मतत्व की चिंता अर्थात उसका ध्यान, मनन ,श्रद्धान चिंतवन करो ,जिसके माध्यम से इस निरंजन निराकार ज्योति स्वरूप की प्राप्ति की जा सके। हमारा पता हमें पता नहीं और जगत का पता हम पता करने में लगे हैं। ऐसा व्यक्ति लापता( मूर्ख)ही कहलाता है ।जिसे स्वयं का पता भी पता नहीं। हम आज तक देहाती बनते आए हैं पर देहातीत (देह + अतीत) नहीं बन पाए हैं ।उस सिद्ध अवस्था को प्राप्त नहीं कर पाए हैं। आज भगवान बनने की होड़ सी मची रही है ।सभी ऐश्वर्य वाली प्रभुता से युक्त बनना चाहते हैं। अपनी ढपली अपना राग। स्वयं तो निराधार और जगत को दिखा रहे आधार ।ऐसे लोगों का नारा है भक्त नहीं भगवान बनेंगे ।आप भगवान बने और सभी भगवान बने यह श्रेष्ठ विचार है, परंतु बिना भक्त बने भगवत सत्ता को प्राप्त करना त्रिकाल असंभव है ।हमने आज तक ऐसी भक्ति नहीं की जिसके माध्यम से भगवान बनने का मार्ग खुल जाए। बिना मार्ग पर चले मंजिल नहीं मिलती। आप लोग कहते हैं आप में जब तक के कोई आपको पता नहीं ।मोक्ष के मंदिर तलक हरगिज़ कदम जाता नहीं। जो बिना भक्त बने भगवान की परिकल्पना मन में रखे हुए है। यह एक विकृत मानसिकता का नकारात्मक परिणाम है। खुदा बनने के पहले खुद को समझना होगा। इस संसार में स्वयं को समझने के तीन ही ऐसे समीचीन माध्यम है जिनका अवलंबन लेकर खुद को समझा जा सकता है। जिसके जीवन में सच्चे देव हैं जिसके जीवन में सच्चे गुरु हैं और जिसके जीवन में सच्चे शास्त्र हैं वही व्यक्ति इन तीन रत्नों के माध्यम से अपने स्वरूप तक पहुंच सकता है। यह शरीर शव बने इसके पहले शिव (मोक्ष) को जाने का मार्ग जानना उस पर चलना होगा। अर्थी से पहले अर्थ को समझें ,उस अर्थ को सार्थक करें वरना अनर्थ निश्चित है ।जो सिद्धि प्रसिद्धि से कोसों दूर है उसने ही अपने आत्म तत्व को सिद्ध किया है ।जिसने खुद को समझने का प्रयास किया है ।पूरी दुनिया ने भी उसी को समझने का प्रयास किया है ।पूरी दुनिया में ऐसे विरले ही लोग हैं जो खुद को समझ पाते हैं वे हीं खुदा बन पाते हैं।जयकुमार जैन जलज