: गाडरवारा, शिशु मंदिर में सर्मपण राशि - पूजा और सांस्कृतिक कार्यक्रम संपन्न
Fri, Feb 16, 2024
शिशु मंदिर में सर्मपण राशि - पूजा और सांस्कृतिक कार्यक्रम संपन्नगाडरवारा । नरसिंहपुर जिले के गाडरवारा नगर में विध्या भारती अखिल भारतीय शिक्षा संस्थान के मार्गदर्शन में संचालित सरस्वती शिशु मंदिर नर्मदा कालोनी मे संगठन की योजना अनुसार सर्मपण निधि कार्यक्रम संपन्न हुआ । इस राशि का उपयोग पूर्वांचल सहित देश के सुदूर वनवासी इलाके में शिक्षा, स्वास्थ्य, चिकित्सा व संस्कार केंद्र संचालन में किया जाता है । इसी अवसर पर विध्या की देवी सरस्वती पूजन का कार्यक्रम करने के साथ बच्चों ने विभिन्न राष्ट्रीय भावना व रामभक्ति से ओतप्रोत कार्यक्रम प्रस्तुत किए जो सभी उपस्थित जनो ने प्रशंसा की । इस अवसर पर संस्था के पूर्व अध्यक्ष अनूप जैन ने कहा कि मां सरस्वती विद्या की देवी हैं उनको स्मरण करते हुए पढ़ाई पर ध्यान देना चाहिए । यह पर्व छात्रों, कलाकारों के लिए महापर्व है ,आगे कहा कि विध्या को सभी प्रकार के धन की अपेक्षा अधिक श्रेष्ठ माना जाता है । इस अवसर पर संस्था अध्यक्ष देवकिशन सोनी सपत्नीक पार्वती देवी के साथ पचासवीं वैवाहिक वर्षगांठ पर सरस्वती पूजा, निधि सर्मपण और बच्चों को मिष्ठान वितरित किया । इनके अलावा गोपाल मालपानी उपाध्यक्ष, सचिव मुरली मालानी शिक्षाविद सुनील शर्मा उमाकांत गुप्ता, नरेंद्र राय, शाला के आचार्य, अभिभावकों की विशेष उपस्थिति रही/प्राचार्य दिनेश शर्मा ने सभी के लिए आभार प्रकट किया ,कार्यक्रमों का संचालन आचार्य रमेश शर्मा गणितज्ञ ने किया ।
: माँ नर्मदा की करुण पुकार सुशील शर्मा की कलम से
Fri, Feb 16, 2024
माँ नर्मदा की करुण पुकार सुशील शर्मा की कलम से
(नर्मदा जयंती पर विशेष आलेख,कविता छन्द्)
सुशील शर्मा
मैं नर्मदा हूँ आप सभी की आदि माँ। मेरी उम्र करोड़ों वर्ष हैं मैंने अनगिनित सभ्यताओं का उत्थान एवं पतन देखा है। पुराणों में मेरे बारे में कहा गया हैत्रिभीः सास्वतं तोयं सप्ताहेन तुयामुनम्सद्यः पुनीति गांगेयं दर्शनादेव नार्मदम्अर्थात सरस्वती में तीन दिन, यमुना में सात दिन तथा गंगा में एक दिन स्नान करने से मनुष्य पावन होता है लेकिन नर्मदा के दर्शन मात्र से व्यक्ति पवित्र हो जाता है।पुण्या कनखले गंगा कुरुक्षेत्रे सरस्वती ।ग्रामे वा यदि वारण्ये पुण्या सर्वत्र नर्मदा ॥गंगा कनखल में एवं सरस्वती कुरुक्षेत्र में पवित्र है, किन्तु नर्मदा चाहे ग्राम हो या वन सभी स्थानों पर पवित्र मानी जाती है । नर्मदा केवल दर्शन-मात्र से पापी को पवित्र कर देती है।भगवन शंकर की पुत्री होने का मुझे सौभाग्य प्राप्त है ,उन्होंने मेरी तपस्या से प्रसन्न होकर मुझे वरदान दिए की मेरे दर्शन मात्र से ही सम्पूर्ण पापों का नाश हो ,प्रलय के समय भी मेरे अस्तित्व बना रहे ,मेरा हर पत्थर प्राणप्रतिष्ठित शिवलिंग होकर पूज्य हो और मेरे किनारों पर समस्त देवताओं का वास हो। लेकिन आज में संकट से गुजर रही हूँ सभ्यता के विकास के साथ साथ नैतिक मूल्यों का पतन मैं देख रही हूँ। वर्तमान में लोग इतने पाप कर रहे हैं की उनको धोते धोते मेरा दामन दागदार होने लगा है।शास्त्र एवं पुराण मुझे संस्कृति,संस्कार एवं ममत्व का प्रवाह मानते हैं लेकिन इस प्रवाह में लोग इतनी गंदगी मिला रहे हैं की उसका प्रक्षालन अब मेरे बस में नहीं रहा है। मध्यप्रदेश की तो मैं जीवन रेखा हूँ लेकिन इस जीवन रेखा को लोग मिटाने पर तुले हुए हैं। पौराणिक ग्रंथों में नदियों के किनारे मलमूत्र त्याग धार्मिक अपराध माना जाता रहा हैं लेकिन अब लोग शास्त्रों की बाते भी नहीं मानते हैं। मेरे उद्गम से लेकर सागर से मिलने तक करीब 120 नाले मल मूत्र एवं अपशिष्ट पदार्थों को मेरे पवित्र जल में घोल रहे हैं इसका जिम्मेदार कौन हैं ?मेरे उद्गम से ही मुझ पर कहर बरपाना शुरू कर दिया है 15 वीं शताब्दी के पूर्व मेरा उद्गम सूर्यकुंड जो की वर्तमान उद्गम नर्मदा कुण्ड से ऊपर है था लेकिन धीरे धीरे मेरा उद्गम नीचे की और खिसकता गया आज सूर्यकुंड गन्दा एवं उपेक्षित पड़ा है मेरे आसपास के जंगलों को नष्ट किया जा रहा है मेरे भाई बहिन जल के स्त्रोतों को मिटाया जा रह है ,मेरे पिता मैकल की छाती को विस्फोटों से भेद जा रहा है। गाडरवारा के पास एक औद्योगिक बिजली का कारखाना लग रह हैं मेरा करोड़ों घन मीटर पानी इसमें लग रह हैं लेकिन इसका प्रदुषण मेरे वक्ष स्थल को विदीर्ण को करेगा लेकिन मैं चुप हूँ क्योंकि मैंने भगवान शंकर को वचन दिया था की मैं हर परिस्थिति को सह कर अपने मानसपुत्रों की सेवा करूंगी।मनुष्य विकास के नाम पर इतना क्रूर हो सकता है यह मैं अनुभव कर रही हूँ।मेरे दोनों तटों पर करीब आठ सौ गांव बसते हैं जिन्हे मैं बहुत स्नेह करती हूँ। मैं इनकी माँ जैसी देखभाल करती हूँ , हर मनोकामना पलक झपकते ही पूरी करती हूँ लेकिन बदलें में ये पुत्र अपना सारा अपशिष्ट मेरे निर्मल जल में मिलाते हैं सुबह मलमूत्र का त्याग मेरे तट पर करते हैं ,सारे गंदे कपड़े मुझे में ही धोते हैं स्वयं से लेकर पशुओं ,वाहनों आदि का अपशिष्ट मेरे निर्मल जल में प्रवाहित उसको गन्दा कर रहे हैं। आखिर माँ हूँ मुझे सब सहना हैं लेकिन इस प्रदुषण का सबसे ज्यादा असर मेरे जल में रहने वाले जीवों पर हो रहा है। पर्यावरण विज्ञानियों के अनुसार पहले मेरे जल में 84 प्रकार के जल जीव पाये जाते थे जो घट कर करीब 40 प्रकार के बचे हैं।अन्य प्रकार जो मेरे जल को प्रदूषित कर रहें हैं निम्न हैं1. घरों एवं मंदिरों के पूजन का निर्माल्य2. पालीथीन एवं नारियल के बूँच एवं खोल3. सड़े गले जानवरों के शव4 . तट के गांवों के निस्तार अपशिष्ट5. लाखों लोगों का मेरे अंदर आकर साबुन लगा कर जल में स्नान करना6. गंदे कपड़े धोना।7. लाखों पशुओं एवं वाहनों का अपशिष्ट8. पंचकोशी यात्राओं से उत्पन्न प्रदुषण9. तट पर लगने वाले मेलों से उत्पन्न गंदगी के कारण प्रदुषण10. तटों पर भंडारों से बचा अपशिष्ट11. शवों की भस्म एवं अस्थियों का विसर्जन12. मेरे तटों की रेत का उत्खनन13 मेरे जल में धार्मिक मूर्तियों के विसर्जन से रासायनिक पेण्ट के कारण प्रदूषण14 औद्योगिक प्रक्षेत्रों को मेरे भरण क्षेत्र से दूर स्थापित करनाइतना सारा प्रदुषण लेकर क्या कोई नदी अपना अस्तित्व बचा सकती हैं,शायद नहीं।हम नदियां कभी भी अपने लिए कुछ नहीं मांगती हैं इस प्रदुषण से हमारा नुकसान तो हम सह लेंगी लेकिन अपने पुत्रों का नुकसान देख कर मुझे रोना आ रहा है। कालिदास को मैंने देखा है वह उसी डाल को काट रह था जिस पर वह बैठा था आज वही स्थिति आप सब की है आप लोग भी मुझे नुकसान पहुंचकर अपना अहित कर रहे हो। शास्त्र कहते हैं की मैं सर्वशक्तिमान हूँ ,सर्वज्ञ हूँ ,सम्पूर्ण हूँ लेकिन मैं अपने पुत्रों को कैसे समझाऊँ की कर्तव्यों का निर्वहन एवं रिश्तों की संवेदनशीलता देवत्व से भी ऊपर है। मैं अनंतकाल से अपने कर्तव्यों का निर्वहन करती चली आ रही हूँ में चाहतीहूँ की आप लोग भी अपने कर्तव्यों का निर्वहन कर अपने पर्यावरण को बचाकर आने वाली पीढ़ी का भविष्य सुरक्षित करें। आपको ज्यादा कुछ नहीं करना सिर्फ छोटे छोटे योगदान देकर आप लोग मेरे जल को अमृत बनाने में सहयोग कर सकते हैं।1. कैसे भी करके मेरी रेत के उत्खनन को रोकना है। जो सक्षम पुत्र हैं जनप्रतिनिधि हैं उन्हें उस ओर ध्यान देना चाहिए।2. पूजा के निर्माल्य को जमीन में गड्ढा बना कर खाद बनायें पूजन का खाद आपके खेतों को कई गुनी फसलों में बदल देगा।3. मेरे तटों पर पालीथीन न लेकर जाएँ अगर कोई पालीथीन ,नारियल के खोल ,बूँच रस्सियाँ या अन्य अपशिष्ट पदार्थ तट पर देखे तो उसे वहाँ से अलग ले जा कर नष्ट करदें।4. तट के गावों पर शिविर लगा कर लोगों को जागरूक करें की वो मेरे पानी में अपशिष्ट पदार्थ ,कपड़े एवं वाहनों का धोना ,पशुओं का नहाना ,साबुन लगा कर नहाना इत्यादि प्रदुषण बढ़ाने वाले कार्यों का त्याग करें।5. पंचकोशी यात्राएं एवं मेले लोगों की आस्थाओं से जुड़े हैं अतः इनका निषेध शास्त्र सम्मत नहीं हैं लेकिन इनके आयोजकों को इस बात पर ध्यान देना होगा एवं सुनिश्चित करना होगा कि मेरे तट पर या घाटों पर इनसे कोई प्रदुषण न फैले। विशेष कर साधु समाज को आगे आना होगा।6. मेरे तट पर लाखों टन शवों की भस्म मेरे जल में प्रवाहित की जाती हैं जिससे बड़ी मात्र में प्रदुषण जल में फैलता हैं मेरे सभी पुत्रों को शपथ लेनी होगी की इस बारे में जागरूकता अभियान चलायें की शवों की भस्म मेरी धारा में प्रवाहित न करके बाहर मेरे जल में घोल कर खेतों में खाद्य के रूप में सिंचित की जावे।यह वैज्ञानिक तथ्य है की शव की भस्म में जमीन के उर्वरा हेतु सभी तत्व मौजूद हैं अगर एक शव की भस्म एक एकड़ में डाली जाती हैं तो दस साल तक उस जमीन में खाद डालने की आवश्यकता नहीं होती है।7. मेरी धारा में धार्मिक मूर्तियों एवं अन्य अपशिष्टों जिनमे रासायनिक लेपों का इस्तेमाल हुआ हो का विसर्जन वर्जित किया जावे एवं अलग कुण्ड बनाकर विसर्जन हो।मुझे अपने से ज्यादा अपनी पुत्रियों की चिंता रहती हैं। मेरी करीब उन्नीस मानस पुत्रियां हैं जो सहायक नदियों के रूप में मुझे प्राप्त हैं जिनमे (दक्षिण तटीय सहायक नदियाँ)हिरदन,तिन्दोनी ,बारना ,कोलार ,मान , उरी ,हथनी,ओरसांग (वाम तटीय सहायक नदियाँ) बरनर ,बन्जर ,शेर ,शक्कर ,दुधी,तवा,गंजाल ,छोटा तवा,कुन्दी ,गोई ,करजन।मेरी प्रिय पुत्री शक्कर दुधी मरणासन्न स्थिति में है।मेरी अधिकांश पुत्रियों के शरीरों को नौचा जा रहा है उनके जल का अतिरिक्त दोहन किया जा रहा है, उन्हें प्रदूषित किया जा रहा है लेकिन मैं मौन हूँ ।किसे दंड दूँ अपने प्यारे पुत्रों को या स्वयं को। मुझे भी गुस्सा करना आता है ,दंड देना आता किन्तु मैं माँ हूँ मैं तो तुम्हे माफ़ कर दूंगी किन्तु मेरी माँ प्रकृति के कोप से मैं भी तुम्हे नहीं बचा पाऊँगी जिस दिन उनके सब्र का बांध टूटेगा तो चारो और प्रलय होगा।माँ आशुतोषी सुशील शर्मा आदि माता हे नर्मदे आत्मपोषी।माँ आशुतोषी माँ आशुतोषी। उमारूद्रांगसंभूता,हे पावन त्रिकूटा।ऋक्षपादप्रसूता,रेवा ,चित्रकूटा।सर्व पाप विनिर्मुक्ता ,हे नर्मदे पुण्य संगम ,,पारितोषी।माँ आशुतोषी, माँ आशुतोषी। दशार्णा ,शांकरी ,मुरन्दला।इन्दुभवा ,तेजोराशि,चित्रोत्पला।दुर्गम पथ गामनी,हे नर्मदे , महार्णवा ,मुरला, सुपोषी।माँ आशुतोषी, माँ आशुतोषी। विदशा ,करभा ,विपाशा।रंजना ,मुना ,सुभाषा।अमल शीतल सतत,हे नर्मदे। अविराम, सुपथ, शत कोषी।माँ आशुतोषी, माँ आशुतोषी। विमला ,अमृता,शोण ,विपापा।महानद ,मन्दाकिनी,अपापा।नील धवल जल ,हे नर्मदे। रम्य अहिर्निश ,सहस्त्र कोशी।माँ आशुतोषी, माँ आशुतोषी। (नर्मदा जयंती पर विशेष) पुण्य सलिला माँ नर्मदे(रेवार्चन )(14 ,12 मात्राएँ ,सम चरण तुकांत ) सुशील शर्मा माँ नर्मदे पुण्य सलिला ,आत्म रूप विधान हो।नादमय ओंकारमय ,स्वस्तिमय संधान हो। शिव स्वेद से उत्पन्न तुम ,पुण्य धन्या शिव सुता।अमरकंटक गोमुखी तुम ,धन्य धारा मृदुलता। सतपुड़ा की मेखला में ,बहे जीवन दायनी।हे रूद्रांगी सम्भूता ,योगिनी मन गामिनी। फेनिल अमृतमयी धारा ,सर्व शोक विनाशनी।पुष्परेखा तमस हरणी ,मातु मोक्ष प्रकाशनी। हे नर्मदा हे त्रिकूटा ,रेवा विपापा मोक्षणी।आशुतोषी माँ नर्मदा ,कल्प सुपोषित तीक्ष्णी। नीलांबरा रत्नाकरी ,मनप्रभा द्रुत गामिनीसर्वा पाप विनिर्मुक्ता,नीलमणि द्युति दामिनी। धन्यधारा माँ नर्मदे ,जगत का कल्याण हो।नीर ले अविराम बहती ,सिंधु तक निर्याण हो। चरण में तेरा पड़ा मैं ,माँ न मुझे विसारिये।चरण रज तन मन लगा लूँ ,माँ रेवा उबारिये।
: नर्मदा जयंती पर विशेष(कुशलेन्द्र श्रीवास्तव)
Fri, Feb 16, 2024
नर्मदा जयंती पर विशेष(कुशलेन्द्र श्रीवास्तव)अस्तगामी सूरज की लाल किरणें जल का श्रंगार कर रहीं थीं वे भी शायद अस्ताचल की ओर प्रस्थान करने के पहिले अपने आपको पवित्र कर लेना चाहतीं थी । सूरज का लाल प्रतिबिम्ब शांत होती जा रहीं जल पर सुन्दर चित्रकारी जैसा उभर आया था एक दम लाल जिसमें अपनी दहक को शान्त हो जाने का आभास था जिसमें पवित्रता को ग्रहण करने की ललक थी । एक लकड़ी की नाव में बैठे कुछ यात्रियों ने बीचधार स ेगजुरते हुए लोटे में जल भर लेने का उपक्रम कर लिया था । ‘‘नर्मदे हर’’’ का जय घोष लहरों को भी कपायमान कर रहा था । एक लड़के ने अथाह जल राषि चुनौती स्वीकार कर ली थी और छलांग लगा दी थी ‘‘छपाक’’ की एक हल्की सी आवाज आई और उसने जल में बहते नारियल को अपने कब्जे में कर लिया था । वह दूर एक उंचे टीले पर खड़ा निहार रहा था लहरों को उसकी निगाहें अविरल, अविराम देख रहीं थीं स्वर्णिम सी आभा बिखेर रही नर्मदा रज को और कल कल कर बहती जलधार को । ओह......यही तो मॉ नर्मदा का अमृतमयी सौन्दर्य है । तेज प्रवाह और विषाल आकार सांझ के इस स्वरूप् में और भी सुन्दर लग रहा था सब कुछ । उपर नभ में अपने घौसलों की ओर लौटते पक्षी और जल में निर्भय होकर विचरण करते जलचर । मॉ की गेद तो निर्भयता का दर्पण होती ही है । मॉ........क्या मॉ को ही पुकार रहीं हैं महिलायें ढोल नगाड़ा, झांझर बजातर हुईंनरबदा मैया ऐसी तो मिली रे, ऐसी मिली रे,जैसे मिल गई महतारी बाप रे !नरबदा मैया ओ..............।मॉ के प्रति समर्पण का संदेष, मॉ के संग होने पर निर्भय होने का संदेष ‘‘जैसे मिल गई महतारी बाप रे’’ कितनी आत्मीय है इन देषी बुन्देलखंडी शब्दों में । दूर किसी कोन परजयकार का नाद चहुंदिषि गूंज रहा है ‘‘हर हर नर्मदे’’ ।कोई कंटकीर्ण मार्ग पर दण्डवत लेट कर प्रणाम करता आ रहा है । लम्बी दूरी तय करने के बाद भी उनके तन पर थकान नहीं है पिछले 4 दिन से लगातार ‘‘सरें’’ भरते यात्रा में तल्लीन है स्त्री-पुरूष और उनका सहयोग करते बच्चे.......उनके चेहरे पर जीवतं हो रहे श्रद्धा-भक्ति और विष्वास के भाव.........‘‘मनौती मांगी थी.............मैया ने उसे पूरा कर दिया अब हम उनके प्रति आभार प्रकट करने जा रहे हैं........’’ हाथ में जटायुक्त नारियल और पथरली भूमि पर पेट के बल दण्डवत........एक उद्घोष ‘‘नर्मदे हर’’ । कितनी श्रद्धा है.....घुटनों छिल गए है चेहरा घूलघुसरित हो गया है पर न दुःख के भाव है और न वेदना केअलक्ष्यलक्ष्य लक्ष पाप लक्ष्य सार सायुधं,ततस्तु जीव जन्तुतन्तु भुक्तिभुक्तिदायकम् ।विरन्चि विष्णु, शंकर स्वकीयधामवर्मदे,त्वदीयपाद पंकजं नमामि देवि नर्मदे ।ंभोग और मुक्ति प्रदान करने वाले तुम्हारे चरण कमलों को में प्रणाम करता हूॅ । नदी के चरण कमल........नहीं मॉ के चरण कमल.......नर्मदा तो मॉ हें न......मॉ के स्नेह की भी कोई पराकाष्ठा होती है........उनके चरण तो कमल से ज्यादा सुन्दर और पवित्र होते हैं, इन चरण कमलों को प्रणाम करने के लिए स्तुति गाई जा रही है ।ै एक दम तट के किनारे बैठे कुछ लोग आरती गा रहे हैं ‘‘ऊॅं जय जगतानन्दी, मैया जय आनंद कंदी, ब्रम्हा हरिहर शंकर रेवा षिव हरि शंकर, रूद्री पालंती ।। ओम जय..........। ढोल नगड़ा बज रहे हैं और दीपो को जल में प्रवाहित करने का क्रम चल रहा है । सैंकड़ों दीप बहती जलधारा में बहते चले जा रहे हैं गंतव्य की ओर मानो सभी के कष्टों को, दुःखों को बहाकर ले जा रहे दूर बहुत दूर समुद्र की ओर मॉ तो चाहती है कि उसके पुत्रों पर कोई कष्ट न आये उसके पुत्र कभी दुःखी न हों.......इसलिए तो वह बहाकर ले जा रही है कामना पूर्ति की आकांक्षा से भरे दीपों को । निष्चल भाव से बहते दीपों की ज्योति से सारा तट प्रकाषित हो चुका है नयनाभिराम दृष्य तट पर दृष्टांकित हो चुका है नभ पर तारों के संग चन्द्रा अठखेलियां कर रहा है और धरा पर दीपों की माल के साथ मॉ नर्मदा भक्तों का दुःख हर रहीं हैं अलौकिक दृष्य, अविस्मरण्ीय दृष्य..........ऐसा तो प्रतिदिन होता है नर्मदा के तट पर......भक्तों की लम्बी कतार और श्रद्धा के भाव दीपों का समूह और जयकारा का उद्घोष......अमावष्या या पूर्णिमा पर यह दृष्य और भी ज्यादा जीवतं हो जाता है विषाल जनसमूह उनका कोलाहल और पवित्र जल के आचमन की ललक.............पर मॉ गंभीर बनी रहती हैमहागंभीर नीरपुर पापधूत भूतलं,ध्वनत् समस्त पातकारि दारिता पद्राचलमफ ।जगल्लये महाभये मृकण्डुसूनु हर्म्यदे,त्वदीय पाद पंकजं नमामि देवि नर्मदे ।।मॉ गंभीर है । नर्मदा का अथाह जल जो कोलाहल के निःषब्द होते ही कलरव का मधुर संगीत प्रसारित करने लगता हे इस संगीत में समाहित हो जाती है सप्त लहरियां........मॉ की लोरियां..... यह केवल जलप्रवाह ही नहीं रह जाता है.....यह तो होती है मॉ के ममत्व की करूणा...............या नैर्सिंगक जगत की चेतना .........‘‘त्वदीय पादपंकजं नमामि देवि नर्मदे’’ का शंकराचार्य जी द्वारा किया गया उद्घोष । कुछ तो अलग है तभी तो ‘‘आनंद की नदी’’ याने नर्मदा कहा गया, चिर कुंवारी नर्मदा........विधान के बंधन को तोड़कर पष्चिम से पूर्व की ओर बहने वाली मेकलसुता.........उंचे-उंचे पहाड़ां को अपने तेज प्रवाह से विख्ांडित कर कूदती-फांदती आगे बढ़ती रेवा......‘‘हर......हर .....नर्मदे........’’हाथ को उंचा उठाकर जयकारा लगाते कंठ.........नंगे पैर कंटकीर्ण पथ पर सुमनपथ का अहसास करते परिक्रमावासी........3 वर्ष 13 दिन की निरंतर गतिषीलता और ओंकारेष्वर स्थित महोदव का जलाभिषेक के साथ परिक्रमा की पूर्णता का गौरवषाली क्षण । क्या केवल नदी मानकर यह सम्पूर्णता पा सकता है कोई...........मॉ माना.........मॉ के आंचल में आनंदनुभूति महसूस की ....मॉ के करूणमयी जल का आचमन किया..........गंगे च यमुने चैव गोदावरी सरस्वती ।नर्मदे सिन्धु कावेरी जलेऽस्मिन् सन्निधि कुरू ।।.मॉ के तट पर स्थित तीर्थें का दर्षन किया.....सार्धत्रिकोटि तीर्थानि गदितानीह वायुना ।दिविभुव्यन्तरिक्षे च रेवायां तानि सन्ति च ।।असंख्य तीर्थो के दर्षन.........जीवन धन्य हो गया ।पुराण कहते हैं कि गंगाजी में स्नान करने का पुण्य और नर्मदा का मात्र दर्षन करने पुण्य दोनो बराबर हैं । 3 वष 13 दिन प्रतिदिन मॉ के दर्षन कल-कल बहते जल का आचमनजीवन को तो धन्य होना ही था । हर घाट का अपना उत्सव मानो नर्मदा तो उत्सवों क तीर्थ ही बन चुकी हैं....हर उत्सव की अपनी संस्कृति............हर उत्सव की अपनी परंपरा........परंपरा में समाहित आस्था.........आस्था में समाहित श्रद्धा...........विषाल भंडारा.........पुड़ी हलुआ.........केवल भोजननहीं है वह.......केवल भूखे का पेट भर देने का प्रदर्षन नहीं है वह........तो प्रसाद है.......उसमें नर्मदा की अमृत जल का समावेष है.......उसमें नर्मदा की स्वर्णिम रज का समावेष है.......मॉ के स्नेह की आषीष की सम्पूर्णता है........कितने ही लोग आकर परसादी ग्रहण कर लें पर भंडारा कभी खत्म होता ही नहीं.......मॉ की दिव्य उपस्थिति हर क्षण महसूस कर ली जाती है........कई बार नर्मदा के जल में ही स्वदयुक्त पुड़ी तली जा चुकी है.......श्रम के स्वेद को उत्सर्जित किये बगैर महिलाओं का समूह निरंतर कार्य में व्यस्त है उनके चेहरे पर सुबह से सांझ तक दमकती रहती है ताजगी और आनंद की अनुभूति ।नर्म्मदा नर्म्मदा सर्व्वमनोरथान्ददाति वै ।कलौ तु नर्म्मदा देवी कल्पवृक्षै भनार्तिहर ।।मेकल पर्वत श्रेणी की अमरकंटक पहाड़ियों से अवतरित होकर अपने स्वरूप् को विकसित करते जनसमुदाय को अपने पावन जल से अभिसिंचित करते गतिषलीता का प्रमाण बन अनेक ऋषि मुनियों की तपःस्थली को अंगीकार करते हुए अपने आभा मंडल से सभी का कल्याण कर रहीं हैं । सामवेद का प्रतीक और षितनया,षांकरी, रूद्ररेहा जैसे सम्बोधनों को स्वीकार करते हुए पुण्य दर्षना नर्मदा सदा सेव्या, सोमोद्भवा, सर्वस्व्या विविधाषब्द शक्ति से पोषित तीव्र प्रेरणाषक्ति समन्वित हैं ।सविन्दु सिंधु सुस्खलत्तरंग अंगरजितं,द्विषत्सुपाप जात-जात कारि बारि संयुतम् ।कृतान्त दूत कालभूत भीतिहारि वर्मदे,त्वदीय पाद पंकजं नमामि देवि नर्मदे ।।अनेकानेक वर्षों से नर्मदा भक्ति-षक्ति और श्रद्धा के संगम का केन्द्र रही है पर अब कुछ गुम सा गया है......श्रद्धा नहीं गुम हुई..........विष्वास कम नही हुआ पर कुछ स्वार्थपरता ने इस पवित्रता को नष्ट करने का कुचक्र अवष्य रच दिया । आधुनिकता ने अपना माया जाल ऐसा फेंका कि ‘‘स्व’’ के आगे श्रद्धा पराजित हो गई । विकास ने ही विनाष की इबारत लिख दी और जिन पेड़-पौघों को गर्व था कि हम मॉ नर्मदा के छत्र-छाया में जी रहे हैं वे नष्ट होते चले गए, बांध बनाने के चक्कर में संस्कृतियों को मिटाते चले गए । बांधों में पानी तो जमा होता गया पर पर हमारे विष्वास पर काई जमती चली गई । हमने नर्मदा जल में ‘‘स्नान’’ करने की बजाए नहाना प्रारंभ कर दिया साबुन को तन पर मल कर, हमने प्लास्टिक की थैलियों का ढेर लगा दिया तट पर हमने बासी-पुरानी पूजन सामग्री के उत्सर्जन का केन्द्र बना दिया आचमनीय जल को । आधुनिकता और परवान चढ़ी और हमारे शौचालयों के अंतिम गेट जल की दिषा में खुलने लगे, हमारी फैक्ट्रियों का दूषित जल नर्मदा के बहते जल की ओर बहने लगा । क्या यही हमारे विकास की परिभाषा है, क्या यही हमारे अंधानुकरण का उदाहरण है । जिस जल को हथेलियों में भरकर हम ईष्वर के प्रसाद की अनुभूति करते रहे हैं क्या उसमें गंदगी फैलाकर हम साहसिक काम कर रहे हैं........कल जब सह जल गंदगी से दूषित हो जायेग तब हमारा तो आचमन करना भी कठिन हो जायेगा.........फिर कैसे होगा पंरपराओं का निवर्हन........क्या हम स्वंय ही प्रकृति के भौतिक अस्तित्व को विनाष की दिषा में नहीं ले जा रहे हैं............क्या हमार अहंकार हमारे ही विनाष का कारण नहीं बन रहा है......क्या उपभोक्तावदी संस्कृति विनाष की संस्कति में परिवर्तित नहीं हो रही है...........मर्यादाओं की सीमा का उल्लंघन नहीं कर रहे हैं....मान्यताओं और अवधारणाओं को बलिवेदी पर नहीं चढ़ा रहे हैं हम........ओह.....स्वार्थ की पराकाष्ठा...........हम स्वंय ही अपने लिए हलाहल पैदा कर रहे हैं.......अपने ही सेवन के लिए..........यह समझते हुए भी कि हमारे कंठ में षिवजी का वास नहीं है,,,,,,,,,,यह जानते हुए भी कि हमें अमरत्व का वरदान नहीं मिला है.........यह जानते हुए भी कि प्रकृति के उपहरों के संरक्षण का ही दायित्व हमारे हिस्से में आया है न कि उसको नष्ट करने का..........प्रदूषित हो रहा है जल...........भयभीत हैं जलचर.......क्या जलचर के न होने की परिस्थितियों को ज्ञान हम कर पाये हैं......... क्या हम स्वंय भी जल के बिना रह सकते हैं......जी सकते हैं........क्या बोतलों में बद पानी ही हमारे जीवन को बचाने के लिए पर्याप्त है...........पर वो भी कितने दिन शेष रहा आयेगा.........फिर जल को तो हम बना नहीं सकते और जल के बनि जी भी नहीं सकते...........याने हम स्वंय अपनी कब्र खोदने का काम करते जा रहे हैं........? प्रष्न तो अनेक हैं पर उत्तर नदारत हैं । केवल मौन हमारे प्रष्नों का उत्तर नहीं हो सकता और न ही जब आप भविष्य में कठघरे में खड़े होगें तब मौन साथ नही देगा । एक पीढ़ी आपसे प्रष्न करेगी और आपके पास जबाब नहीं होगा । जागना होगा हमें ताकि नर्मदा बचे.......जल बचे..........प्रदूषण से मुक्ति मिले और हमारे चेहरों पर खिलने वाली मुस्कान को अमरत्व मिले ।