: गाडरवारा,स्वर्णकार समाज द्वारा अजमीढ़ जयंती मनाई गई*
Sun, Oct 9, 2022
*स्वर्णकार समाज द्वारा अजमीढ़ जयंती मनाई गई*गाडरवारा। स्वर्णकार समाज के आराध्य देव महाराजा अजमीढ़ देव की जयंती का आयोजन स्वर्णकार समाज गाडरवारा द्वारा स्थानीय स्वर्णकार भवन मैं समारोह पूर्वक मनाया गया। जिसमें स्वर्णकार समाज की महिला मंडल एवं नव युवकों ने बड़े उत्साह के साथ भाग लिया कार्यक्रम के प्रारंभ में महाराजा अजमीढ़ देव की पूजन अर्चन आरती की गई । उसके उपरांत चल समारोह का आयोजन किया गया जिसमें माता लक्ष्मी अन्नपूर्णा की झांकी सजाई गई लोगों की धन धन समृद्धि के लिए माता द्वारा रत्न आभूषण एवं अन्य का भंडार भरा रहे। इसके लिए अन्य वितरण किया गया साथ ही ढोल डीजे बाजे एवं राधा कृष्ण के रूप में सजाए गए बालक बालिकाओं द्वारा राधा कृष्ण की लीलाओं का नृत्य गान किया गया । नगर के प्रमुख मार्गो से होते हुए उन्हें स्वर्णकार भवन में एक सामाजिक गोष्टी के रूप में कार्यक्रम का समापन किया गया, जिसमें समाज के सभी वर्गों के बंधुओं मातृ शक्तियों द्वारा सहयोग प्रदान किया गया। कार्यक्रम में प्रतिभावान छात्र छात्राओं एवं बुजुर्ग जनों का सम्मान किया गया । करेली स्वर्णकार समाज के अध्यक्ष एवं उनके साथियों का सम्मान किया गया ।
: हे शरद के चंद्र दिखते तुम नवल, शरद पूर्णिमा एवं पं.सुशील शर्मा के जन्मदिन पर विशेष
Sun, Oct 9, 2022
पं.सुशील शर्मा द्वारा शरदपूर्णिमा व जन्मदिन पर रचित रचना
हे शरद के चंद्र ये शरद के चन्द्रतुम इतने शुभ्र शीतलप्यार में पगे से।कुछ सोए कुछअधनीदें जगे से।स्वप्नीले आसमान मेंतुम इतने निर्मलहे शरद के चंद्रतुम इतने शुभ्र शीतल। नील लोहित शामका है इशारा।उड़ती गोधूलि बेलाअद्भुत नजारा।नील मणि सदृश्यआकाश में तरल।हे शरद के चंद्रतुम इतने धवल। प्रिय प्रेम पाश में बंधीअनवरत विकल।ये चांदनी क्यों बिछीहीरक सी तरल।ये नवयौवना सी सरिताक्यों भागे उछल उछल। हे शरद के चंद्रदिखते तुम नवल।
गाडरवारा के गौरव एवं प्रसिद्ध साहित्यकार पं.श्री सुशील शर्मा जी के जन्म दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ,,,
: गाड़रवारा ,स्वर्णकार समाज के आराध्य महाराज अजमीढ़ जी की जयंती पर उनका इतिहास
Sun, Oct 9, 2022
श्री अजमीढ़ जी महाराज का इतिहासकिसी भी जाति के इतिहास में झांकने पर प्रकाश-पुंज की भांति जो महामानव दृष्टिगोचर होते है वे ही उस जाति के लिए संबल और प्रेरणा स्त्रोत हुआ करते है। जिन्हें वह जाति अपने पितृ-पुरुष के रुप में मानती है। इसी तरह मैढ़ क्षत्रिय स्वर्णकार समाज श्री महाराजा अजमीढ़जी को अपना पितृ-पुरुष (आदि पुरुष) मानती है। वैसे ऐतिहासिक जानकारी जो विभिन्न रुपों में विभिन्न जगहों पर उपलब्ध हुई है उसके आधार पर हम मैढ़ क्षत्रिय अपनी वंशबेल को भगवान विष्णु से जुड़ा हुआ पाते हैं। कहा गया है कि भगवान विष्णु के नाभि-कमल से ब्रह्माजी की उत्पत्ति हुई। ब्रह्माजी से अत्री और अत्रीजी की शुभ दृष्टि से चंद्र-सोम हुए। चंद्रवंश की 28वीं पीढ़ी में अजमीढ़जी पैदा हुए। महाराजा अजमीढ़जी का जन्म त्रेतायुग के अन्त में हुआ था। मर्यादा पुरुषोत्तम के समकालीन ही नहीं अपितु उनके परम मित्र भी थे। उनके दादा महाराजा श्रीहस्ति थे जिन्होंने प्रसिद्ध हस्तिनापुर बसाया था। महाराजा हस्ति के पुत्र विकुंठन एवं दशाह राजकुमारी महारानी सुदेवा के गर्भ से महाराजा अजमीढ़जी का जन्म हुआ। इनके अनेक भाईयों में से पुरुमीढ़ और द्विमीढ़ विशेष प्रसिद्ध हुए। द्विमीढ़जी के वंश में मर्णान, कृतिमान, सत्य और धृति आदि प्रसिद्ध राजा हुए। पुरुमीढ़जी के कोई संतान नहीं हुई। महाराज अजमीढ़ की दो रानियां थी सुमित और नलिनी। इनके चार पुत्र हुए बृहदिषु, ॠष, प्रियमेव और नील । इस प्रकार महाराजा अजमीढ़जी का वंश वृद्धिगत होता गया, अलग-अलग पुत्रों-पौत्र,प्रपोत्रों के नाम से गोत्र उपगोत्र चलते गये। हस्तिनापुर के अतिरिक्त अभी के अजमेर के आसपास का क्षेत्र मैढ़ावर्त के नाम से महाराजा अजमीढ़जी ने राज्य के रुप में स्थापित क्या और वहां और कल्याणकारी कार्य किये।