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: झालावाड़ की घटना पर कविता (सिस्टम का श्राद्ध)

Aditi News Team

Sun, Jul 27, 2025
सिस्टम का श्राद्ध (झालावाड़ की घटना पर कविता)   झालावाड़ की वो सुबह, प्रार्थना में डूबे मासूम, ज्ञान के मंदिर में, मौत का तांडव, और फिर, वही पुरानी धुन। छत गिरी, चीखें उठीं, सात नन्ही जानें, मलबे में दफन। अखबारों में सुर्खियां, टीवी पर चीखते एंकर, और नेताओं के घड़ियाली आंसू। जांच के आदेश!, "कड़ी कार्रवाई होगी!" ये रटा-रटाया संवाद, कानों में गूंजता है, जैसे कोई फटा हुआ टेप रिकॉर्डर। पंद्रह मिनट में बन जाती है कमेटी, पांच मिनट में रिपोर्ट तैयार।   फिर शुरू होता है, बलि का बकरा ढूंढने का खेल। अधिकारी मीटिंग में, चाय-पकौड़े खाते हुए, तय करते हैं, किसे लपेटना है। मास्टर जी ने ध्यान नहीं दिया! क्लर्क ने फाइल आगे नहीं बढ़ाई! पंचायत सचिव को मरम्मत का पता नहीं था! और धड़ाम से गिरते हैं, कुछ छोटे-मोटे कर्मचारी।   स्कूल का प्रिंसिपल, बेचारा चपरासी, शायद कोई वार्ड मेंबर भी। सस्पेंड हुए, ट्रांसफर हुए, किसी की नौकरी गई, किसी की इज्जत। अरे भाई! वो तो बेचारे मोहरे थे, जिन्हें अपनी जेब से भी कई बार, स्कूल की टूटी खिड़की, या नल का लीकेज ठीक कराना पड़ा था।   मगर वो बड़ी मछलियां कहाँ हैं? वो ठेकेदार, जिसने घटिया माल लगाया था? वो इंजीनियर, जिसने ओके की मुहर लगाई थी? वो माननीय जी, जिनके बंगले पर करोड़ों का बजट खर्च हुआ, पर स्कूलों की जर्जर हालत दिखी नहीं? वो आला अधिकारी, जिनकी मेज़ पर सालों से धूल फांक रही थी, मरम्मत के नाम पर आई फाइल?   नहीं! उनका बाल भी बांका नहीं होगा। उनके पास है सिस्टम का कवच, राजनीति की ढाल, और ऊपरी सांठगांठ का ब्रह्मास्त्र।   वे तो बस एक प्रेस कॉन्फ्रेंस करेंगे, मुआवजे का ऐलान करेंगे, और फिर अगली घटना का इंतज़ार करेंगे। बच्चे मरते रहेंगे, ज्ञान के मंदिर श्मशान बनते रहेंगे, और सिस्टम, अपनी लीपापोती से, श्राद्ध मनाता रहेगा, छोटी मछलियों का। क्योंकि बड़ी मछलियाँ, आज भी पानी में हैं, और कल भी रहेंगी, आज़ाद! सत्ता के तालाब में तैरती हुई।   सुशील शर्मा

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