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: जैसा बांस वैसी बांसुरी, मुनि श्री निरंजनसागर जी महाराज

Aditi News Team

Sun, Feb 19, 2023
जैसा बांस वैसी बांसुरी, मुनि श्री निरंजनसागर जी महाराज कुंडलपुर ।साइंस ऑफ लिविंग अर्थात जीवन विज्ञान का जिसको आनंद लेना है जिसे समझना है उसे कार्यकाल व्यवस्था को सर्वप्रथम समझना होगा। तभी हम उसे अपने जीवन में उतार सकते हैं ।आचार्य कहते हैं "कारण सदर्श कार्यम "अर्थात कारण के अनुरूप ही कार्य होता है ।जैसा कारण होता है कार्य भी वैसा ही होता है ।कारण अशुद्ध होता है तो कार्य अशुद्ध होता है। और कारण शुद्ध होता है तो कार्य भी शुद्ध होता है। अशुद्ध कारण से कभी त्रिकाल में भी शुद्ध कार्य घटित नहीं हो सकता है ।बिना कारण के भी कोई कार्य संपन्न नहीं होता, और कारण के होते पर भी कार्य हो जाए यह भी आवश्यक नहीं ।परंतु कार्य जब भी होगा तो वह बिना कारण के नहीं होगा ।यह साइंस ऑफ लिविंग का आधार है। आप लोग कहते हैं "ना रहेगा बांस ना बजेगी बांसुरी" अर्थात बांस कारण है और बांसुरी कार्य है। बिना बांस रूपी कारण के बांसुरी रूपी कार्य घटित नहीं हो सकता। बिना बांस की बांसुरी बन नहीं सकती ।और बांस रूपी कारण यदि सदोष है अर्थात उसमें किसी कीट -जीव आदि का प्रकोप है या उसका आकार प्रकार आदि ठीक नहीं है या उसकी गुणवत्ता में कोई कमी है तो फिर बांसुरी रूपी कार्य नहीं हो सकता ।प्रत्येक स्थान पर यह कार्य -कारण व्यवस्था लागू होती है। संपूर्ण संसार में कोई भी इससे अछूता नहीं है ।कार्य -कारण व्यवस्था में सबसे महत्वपूर्ण है उद्देश्य। उस कार्य को किस उद्देश्य को लेकर अर्थात किस लिए किया जा रहा है। उस उद्देश्य पर ही उसका फल (परिणाम) निर्धारित होता है ।सिंहनी, बिल्ली आदि जितने भी मांसभक्षी जीव हैं वह अपने पंजों से जबड़े आदि से अन्य जीवो का घात करते हैं। उनका मांस भक्षण करते हैं और उसी जबड़े से उसी पंजो से अपने बच्चों का लालन पालन करते हैं। पंजा वही जबड़ा वही परंतु अपनी संतान का पालन पोषण का उद्देश्य होने पर उनका रक्षण हो रहा है और पंजा वही जबड़ा वही परंतु अन्य जीव का घात करने का उद्देश्य होने पर उनका भक्षण हो रहा है ।माता पिता अपने पुत्र पुत्री को डांट रहे मार रहे हैं। क्यों? क्योंकि उनकी दृष्टि उनके सुधार की ओर है ।संप्रदान अर्थात उद्देश्य ही आपका परिणाम घोषित करता है। जिस तरह का आप का परिणाम (भाव) रहेगा उसी तरह का आपको परिणाम (फल )मिलेगा। हमारा उद्देश्य क्या है मंदिर जाने का, पूजन करने का, विधान करने का, अभिषेक आदि धार्मिक क्रियाएं करने का। आचार्य कहते हैं यस्मात क्रिया: प्रतिफलन्ति न भाव शून्या अर्थात भाव रहित क्रियाएं कभी सफलता को प्राप्त नहीं होती। जिस क्रिया को हम कर रहे हैं उस क्रिया में उस संबंधित भाव भी लगने चाहिए ,आने चाहिए। हम क्रियाओं का निषेध नहीं कर रहे हैं वरना कल से आप मंदिर जाना, अभिषेक, विधान ,दान आदि धार्मिक क्रियाओं को छोड़ दें। बल्कि उन क्रियाओं को करते-करते वह भाव हमारे भीतर लाने का प्रयास करना है ।हमें बांस से बांसुरी बनना है ना कि बांस की फांस बन कर रह जाना है। संकलन---- जयकुमार जैन जलज

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