: शासकीय हाई स्कूल सहावन में गुरुपूर्णिमा पर्व मनाया गया
Mon, Jul 22, 2024
शासकीय हाई स्कूल सहावन में गुरुपूर्णिमा पर्व मनाया गया
गाडरवारा। गत दिवस दिनांक 21-7- 2024 को शासकीय हाई स्कूल सहावन में प्रातः 8:00 बजे से गुरु पूर्णिमा महोत्सव मनाया गया सर्वप्रथम प्राचार्य श्री सुशील शर्मा ने मां सरस्वती जी के चित्र पर माल्यार्पण कर विधि विधान से पूजन किया तथा शाला में पदस्थ अन्य शिक्षकों ने मां सरस्वती की पूजन अर्चन की तत्पश्चात छात्र-छात्राओं ने मां सरस्वती वंदना एवं गुरु वंदना कर कार्यक्रम की शुरुआत की कक्षा दसवीं से छात्र अरुण कहार ने एवं कक्षा दसवीं की छात्रा कुमारी गरिमा साहू संस्कृति लोधी अंकिता साहू और पूजा पटेल ने गुरु कृपा पर अपना सार गर्भित संबोधन दिया कार्यक्रम के अंत में प्राचार्य महोदय एवं उपस्थित गुरुजनों ने अपने संबोधन में गुरु के महत्व पर प्रकाश डाला तथा उपस्थित सभी विद्यार्थियों को आशीर्वाद प्रदान किया।
: कोडिया गोशाला की जमीन पर हुआ बृहद पोधारोपण
Mon, Jul 22, 2024
कौडिया गोशाला की जमीन पर हुआ बृहद पोधारोपण
गाडरवारा_ ग्राम पंचायत कोडिया के गोशाला की जमीन पर नगर गाडरवारा एवं कोडि या की विभिन्न संस्थाओं ने पौधारोपण किया एक पौधा मां के नाम अभियान के तहत नगर गाडरवारा की सत्य साई सेवा समिति, कदम संस्था, लायन्स क्लव ,दयोदय गो शाला ,कन्या हाईस्कूल कोडिया ,ग्राम पंचायत कोडिया, ,,नया सराफा संगठन और शिक्षक समूदाय ने आम ,जामुन , अशोक ,वील ,कदम ,वादाम और अन्य प्रकार कै पोधे लगाये गये इस मौके पर मनोज वसा ,शशि भूषण श्रीवास्तव ,राजीव जैन ,अनुज जैन ,जय मोहन शर्मा ,कदम प्रमुख अजय खत्री , लायन्स क्लव प्रमुख , सुरेन्द्र साहू ,नरेन्द्र कोरव ,सुरेन्द्र पटैल शिक्षक , नीलेश साहू , कंछेदी लाल धानक. ,सरपंच कोडिया, उपसरपंच , पंच और अन्य लोग उपस्थित रहे उपस्थित लोगों ने कहा लगाए हुए पौधों का संरक्षण भी किया जाएगा इस मोके पर 51 पोधो का रोपण किया गया ।
: विश्व का अनोखा रहस्य, चंबल के बीहड़ों के बीच 400 वर्ष पुराना अटेर का किला जिसके दरवाजे से आज भी टपकता खून,
Mon, Jul 22, 2024
पंकज पाराशर छतरपुर
विश्व का अनोखा रहस्य, चंबल के बीहड़ों के बीच 400 वर्ष पुराना अटेर का किला जिसके दरवाजे से आज भी टपकता खून,
रहस्ययमी किला का पुरानी कथाओं व महाभारत में दुर्ग का जिक्र
आज हम आपकों बताने जा रहे है ऐसे किले के बारे में जो अब तक रहस्ययमी रहा है। जिसके बारे में न तो आज तक आपने सुना होगा और न ही विश्व में देखा होगा। दुनिया से अनदेखा इस किले के बारे में हाल में शोधकर्ताओं ने इसके रहस्य को जाना है। किले का जिक्र पुरानी कथाओं में तो था ही।जानकारी से पता चला है कि यह किला 400 साल पुराना है। जिसका जिक्र महाभारत के समय में भी हुआ है। इस किले से कई किवदंतियां जुड़ी हुई है जिसमें सोने व चांदी से भरे खाजाने के साथ ही हानियां तिलिस्म की और खजाने के कई रहस्य भी जुड़े हुए हैं। जी हां हम बात कर रहे हैं चंबल के बीहड़ों के बीच 400 साल पुराना अटेर के किले की। वो किला जहां सदियों तक भदावर राजाओं ने शासन किया। इसी वंश के साथ रहस्य जुड़ा हुआ है जो अटेर के किले को और भी खास बनाता है। साथ ही इस किले से कई किवदंतियां जुड़ी हुई हैं।
महाभारत में है इस दुर्ग का जिक्र
अटेर का किले की सैकड़ों किवदंती, कई सौ किस्सों और न जाने कितने ही रहस्य को छुपाए हुए चुपचाप सा खड़ा दिखाई देता है। जैसे मानो अभी उसके गर्त में और भी रहस्य हों। महाभारत में जिस देवगिरि पहाड़ी का उल्लेख आता है यह किला उसी पहाड़ी पर स्थित है। इसका मूल नाम देवगिरि दुर्ग है। इस लिहाज से यह किला और भी खास हो जाता है।
खूनी दरवाजे से हर वक्त टपकता है खून
किले में सबसे चर्चित है यहां का खूनी दरवाजा। आज भी इस दरवाजे को लेकर किवदंतिया जिले भर में प्रचलित है। खूनी दरवाजे का रंग भी लाल है। इस पर ऊपर वह स्थान आज भी चिन्हित है जहां से खून टपकता है। इतिहासकार और स्थानीय लोग बताते है कि दरवाजे के ऊपर भेड़ का सिर काटकर रखा जाता था। भदावर राजा लाल पत्थर से बने दरवाजे के ऊपर भेड़ का सिर काटकर रख देते थे, दरवाजे के नीचे एक कटोरा रख दिया जाता था।
खजाने के लालच ने बर्बाद किया इतिहास
चंबल नदी के किनारे बना अटेर दुर्ग के तलघरों को स्थानीय लोगों ने खजाने के चाह मे खोद दिया। अटेर के रहवासी बताते हैं कि दुर्ग के इतिहास को स्थानीय लोगों ने ही खोद दिया है। इस दुर्ग की दीवारों और जमीन को खजाने की चाह में सैकड़ों लोगों ने खोदा है, जिसकी वजह से दुर्ग की इमारत जर्जर हो गई है l
भदौरिया शासक ने बनवाया ये रहस्मयी किला
अटेर के किले का निर्माण भदौरिया राजा बदनसिंह ने 1664 ईस्वी में शुरू करवाया था। भदौरिया राजाओं के नाम पर ही भिंड क्षेत्र को पहले बधवार कहा जाता था। गहरी चंबल नदी की घाटी में स्थित यह किलाा भिंड जिले से 35 किलोमीटर पश्चिम में स्थित है। चंबल नदी के किनारे बना यह दुर्ग भदावर राजाओं के गौरवशाली इतिहास की कहानी बयां करता है।