नाग धरती के प्रहरी
(नागपंचमी पर कविता)
धरती के गहरे गर्भ में,जड़ों की उलझी भूलभुलैया में,शिला की दरारों औरझाड़ियों की नमी भरी छाँव मेंबसते हैं नागअनगिनत आकारों, रंगों, और स्वभावों वाले। वे न तो केवल भय हैंन ही केवल पूजा का प्रतीक,वे हैं पृथ्वी की उसपुरानी कथा के पात्रजो सृष्टि के संतुलन कोचुपचाप थामे हुए हैं। उनकी आँखों में चमकता हैसमय का अनंत प्रवाह,पलकों के बिना भीवे देख लेते हैंवह सबजो हम अपनी खुली आँखोंसे नहीं देख पाते। वे रेंगते हैं मौन,पर हर कदमधरती को नई धुन देता है।उनकी जीभ,दो फाँकों में बंटीमानो दो दिशाओं का मार्गदर्शन,सूँघने और परखने की अद्भुत शक्ति। नागधरती के चिकित्सक भी हैंचूहों की अंधाधुंध बढ़ती भीड़उनके बिना खेतों को उजाड़ देती।मेंढकों और छिपकलियों का संतुलन,कीड़ों का रहस्य,सब उनकी उपस्थिति सेसुरक्षित है। वे कभी-कभीमानव की बस्तियों के किनारेआ जाते हैं,न भय फैलाने,न हिंसा करने,बस क्योंकिधरती पर उनका घरहमने छीन लिया है। उनकी देह पर खिंची हुईतराशी हुई काष्ठ जैसी शल्कें,धूप में चमकती हैंमानो किसी प्राचीन योद्धा का कवच।उनके रंगहरीतिमा, धूसर, नीली आभा,कभी ज़हरीली चेतावनी,कभी छिप जाने का छलावरण। विष उनकी रक्षा है,न आक्रमण की प्रवृत्ति।वो काटते नहीं,जब तक उन्हेंमृत्यु का भय न छू ले।फिर भी,हम उन्हेंडर और अंधविश्वास कीपरिधि में बाँध देते हैं। नागपंचमी का यह पर्वकेवल दूध चढ़ाने काअनुष्ठान नहीं,यह स्मृति हैकि यह धरतीसिर्फ हमारी नहीं,उनकी भी हैजिन्होंने लाखों वर्षों सेसृष्टि के संतुलन को संभाला है। हम भूल जाते हैंकि जिन नागों की पूजा करते हैं,उन्हें मारते भी हैंउनकी खाल के लिए,उनके भयावह नाम के लिए।हम यह नहीं देखतेकि उनके बिनाखेत उजड़ेंगे,जंगल सूखेंगे,और जैव विविधताअपना स्वर खो देगी। धरती का हर नागएक कहानी हैप्रकृति की,जीवन की रक्षा की,संतुलन की।उसकी जीभ का कंपनहवा में लिखता हैएक अदृश्य श्लोक"हम भी तुम्हारे साथइस संसार में हैं।" आज नागपंचमी परसिर्फ दूध नहीं,बल्कि एक संकल्प लेना हैकि उनके घर नहीं उजाड़ेंगेउनकी देह का सौदा नहीं करेंगे,और उनके रहस्यमय जीवनको डर नहीं,सम्मान देंगे। क्योंकि नागसिर्फ लोककथाओं के पात्र नहीं,वे इस धरती केअनसुने प्रहरी हैंजो मौन रहकर भीजीवन की रक्षा करते हैं।
सुशील शर्मा