: गोपी गीत हुए अवतरित तुम जब माधव बैकुंठी ब्रजधाम प्रभो
Sun, Mar 31, 2024
गोपी गीत
(कुकुभ /लावणी /ताटंक छंद,
प्रति चरण 16 ,14 मात्राएँ)
(गोपी गीत पाठ श्रीमदभागवत महापुराण के दसवें स्कंध के रासपंचाध्यायी का 31 वां अध्याय है। इसमें 19 श्लोक हैं। रास लीला के समय गोपियों को मान हो जाता है । भगवान् उनका मान भंग करने के लिए अंतर्धान हो जाते हैं । उन्हें न पाकर गोपियाँ व्याकुल हो जाती हैं |वे आर्त्त स्वर में श्रीकृष्ण को पुकारती हैं, यही विरहगान गोपी गीत है । इसमें प्रेम के अश्रु, मिलन की प्यास, दर्शन की उत्कंठा और स्मृतियों का रूदन है । भगवद प्रेम सम्बन्ध में गोपियों का प्रेम सबसे निर्मल, सर्वोच्च और अतुलनीय माना गया है।) हुए अवतरित तुम जब माधवबैकुंठी ब्रजधाम प्रभो ।शील सुंदरी श्री लक्ष्मी कानिज प्रवास अविराम प्रभो।किये समर्पित प्राण आपकोभटकें दसों दिशाओं में।कृपा करो हे माधव हम परतुम मन की आशाओं में । 1 हृदय नाथ प्रभु आप हमारेहम सेवक तुम स्वामी हो।राजीव लोचन नयन तुम्हारेप्रभु तुम अन्तर्यामी हो।नयन कटारी से हर लीनेतुमने प्राण हमारे हैं।नहीं अस्त्र ही प्राण निकालेंघातक नयन तुम्हारे हैं। 2 पुरष शिरोमणि मुरलीवालेसब के तारण हार प्रभो।हने अघा,वृषभा ,व्योमासुरसबके प्राणाधार प्रभो।गर्व विखंडित किया इन्द्र कानथा कालिया विष लहरी।रक्षित किये प्राण हम सबकेआप प्राण के हैं प्रहरी। 3 मात्र यशोदा पुत्र नहीं तुमअंतरतम जगदीश्वर हो।सचराचर अन्तर्यामी प्रभुसबके तुम परमेश्वर हो।सृष्टि का कल्याण विहित करब्रह्मा जी से प्रार्थित हो।हेतु जगत कल्याण समर्पितयदुवंशी कुल के सुत हो। 4 श्री चरणों में शीश झुका करजो माँगा वह पाता है।शरण तुम्हारी जो भी गहतावह निर्भय हो जाता है।जन्म -मृत्यु के बंधन कटतेप्रभु तुम जिसे सनाथ करो।नेहपूर्वक जिसे गहें श्रीवो कर मेरे माथ धरो । 5 हे ब्रज नंदन ,दुःख निकंदनमधु मुस्कानें मंडित हैं।मंदहास स्मित श्री अधरों सेघन घमंड सब खंडित हैं।अहो सखे !मत रूठो हमसेक्यों हमसे यह दूरी है।हम अबला असहाय नरी प्रभुश्यामल दर्श जरुरी है। 6 मधुरिम सुंदरतम प्रभु पग हैंपाप नष्ट कर देते हैं।श्री वन्दित प्रभु चरण आपकेसारे दुख हर लेते हैं।गौ बछड़ों के पीछे चलतेविषधर के फण पर नचते।शांत विरह की व्यथा करो प्रभुक्यों न हृदय पर पग रखते। 7 मधुर अधर वाणी सुमधुर हैशब्द ध्वनि आकर्षक सब।ज्ञान बुद्धि सब हुए समाहितमोहक छवि के दर्शक सब।सुन -सुन प्रभु वाणी का अमृतमोहित सब प्रभु प्यारी हैं।वाणी रस उपहार करो प्रभुजिसकी हम अधिकारी हैं। 8 दिव्य कर्म लीला अमरित समविरह पीर में जीवन है।ऋषि मुनि ज्ञानी सब गुण गातेपाप -ताप का मर्दन है।श्रवण मात्र कल्याण सुमंगललीला मधुरिम जो गाता।नहीं धरा पर उसके जैसा ,हृदय उदार परम दाता । 9 हँसत -लसत वो तिरछी चितवनवो लीला प्यारी -प्यारी।मग्न हृदय आनंदित मन थावो अँखिया कारी -कारी।वो अभिसारी मिलन ठिठोलीप्रेम भरी मीठी बातें।क्षुब्द हृदय अब तुम बिन छलियासूनी -सूनी अब रातें। 10 चरण कमल कोमल सुंदर हैंहे प्रियतम प्यारे स्वामी।ब्रज चौरासी कोस भ्रमण करगऊओं के तुम अनुगामी।युगल चरण में कंकड़ काँटेतिनके कुश चुभ जाते हैंतन -मन सब बैचेन व्यथित होदुःख बहुत हम पाते हैं। 11 सांध्यकाल जब तुम घर लौटोहम सब दर्शन को भटकें।धूल-धूसरित मुखड़े पर प्रियघुँघराली अलकें लटकें ।रूप सलोना मधुर मनोहरदेख हृदय ललचाता है।मिलने की उत्कट इच्छा मेंहुआ बावरा जाता है। 12 एकमेव हो नाथ आप हीपीड़ा को हरने वाले।शरणागत की हर इच्छा कोसदा पूर्ण करने वाले।श्री सेवित पृथ्वी के भूषणभव बाधा प्रभु आप हरो।कुंजबिहारी चरण आपकेवक्ष हमारे आप धरो। 13 अधरामृत सुख कर प्रिय माधवविरह जन्य सब शोक हरे।आत्म हृदय मन आनंदित होसुन वंशी सुर भाव भरे।पी कर यह अधरामृत केशवमिटें वासनाएँ गहरी।मंत्रमुग्ध मादल मन सुनकरदिव्य मधुर वह स्वर लहरी। 14 युग सम बीते पल छिन दिन सबवन विहार जब आप गए।सांध्य समय केशव जब लौटेमुख निहार आनंद भए।मधुर मनोहर सुंदर मुख परशोभित घुँघराली अलकें।क्रूर विधाता ने क्यों रच दींनयन बंद करती पलकें। 15 हे केशव तुमसे मिलने कोपति पुत्र बंधु कुल छोड़े।करी अवज्ञा उनकी हमनेतुमसे मन नाता जोड़े।मधुर गान सुनकर हम भागेरात अँधेरे तुम न मिले।हम असहाय नारियाँ छलियाक्यों तुम हमको छोड़ चले। 16 करते थे तुम नित्य ठिठोलीऔर प्रेम की मृदु बातें।प्रेम भरी चितवन कान्हा कीथीं अमूल्य वो सौगातें।है विशाल वक्षस्थल प्रभु काश्री जी जहाँ निवास करें।हृदय हुआ आसक्त आप परमिलन लालसा आत्म भरें। 17 सब ब्रज जन की पीड़ा हरता ,नष्ट सभी दुख-ताप प्रभो।यह अति शुभ प्राकट्य आपकाकल्याणक जग आप प्रभो।हे प्रभु इस आसक्त हृदय मेंप्यारी छवि है मोहन की।कोई औषधि दे दो कान्हा ,मिटे पीर इस जीवन की। 18 अंबुज कोमल जैसे प्रिय पगकुच कठोर दृढ़ छातीं है।कैसे रखें वक्ष पर श्री पगहम गोपी सकुचातीं हैं।जब ये पग भटकें जंगल मेंपीर हृदय में जगती है।जीवन माधव तुम्हें समर्पितश्री पग प्रीत उमगती है। 19छंद काव्यानुवाद -सुशील शर्मा
: कुंडलपुर में निर्यापक श्रमण श्री समयसागर जी महाराज का मुनि दीक्षा दिवस मनाया गया
Sun, Mar 31, 2024
कुंडलपुर में निर्यापक श्रमण श्री समयसागर जी महाराज का मुनि दीक्षा दिवस मनाया गयाकुंडलपुर दमोह ।सुप्रसिद्ध सिद्ध क्षेत्र जैन तीर्थ कुंडलपुर में विराजमान संत शिरोमणि आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज के शिष्यों के बीच पूज्य निर्यापक श्रमण मुनि श्री समयसागर जी महाराज का मुनि दीक्षा दिवस भव्यता के साथ मनाया गया ।इस अवसर पर पूज्य निर्यापक श्रमण मुनि श्री संभव सागर जी महाराज ने कहा आज जेष्ठश्रेष्ठ प्रथम मुनि श्री समयसागर जी महाराज का 45 वां मुनि दीक्षा दिवस है ।समय शब्द के बहुत अर्थ होते हैं। हम सब तो समय का ध्यान करने ही वाले हैं। समय का सदुपयोग करो गुरु मुख से कई बार सुना है ।अब हमें समझ में आ रहा है उनके कहे वाक्य का अर्थ ।पूज्य मुनि श्री विनम्र सागर जी महाराज ने कई संस्मरण सुनाते हुए बताया गुरुदेव ने 10 निर्यापक मुनिराज को संघ की व्यवस्था करने की जवाबदारी दी है। जो सब मिलकर संघ को सुव्यवस्थित करेंगे। जेष्ठश्रेष्ठ प्रथम मुनिराज की मुनि दीक्षा आज ही के दिन द्रोणागिरी सिद्ध क्षेत्र पर आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज के कर कमलों से हुई थी ।निर्यापक मुनि श्री प्रसाद सागर जी महाराज ,मुनि श्री प्रवोध सागर जी महाराज ,मुनि श्री प्रशस्तसागर जी महाराज ,मुनि श्री निश्चय सागर जी महाराज, मुनि श्री निराकुल सागर जी महाराज, आर्यिकारत्न श्री चिंतनमति माताजी ने पूज्य निर्यापक श्रमण श्री समयसागर जी महाराज के व्यक्तित्व, कृतित्व पर प्रकाश डाला। इस अवसर पर सभी मुनिराज ,आर्यिका माता जी के साथ बड़ी संख्या में श्रावक, श्राविकाओं की उपस्थिति रही।
: कुंडलपुर में मुनि संघो का निरंतर आगमन-- हुआ मंगल मिलन
Sat, Mar 30, 2024
कुंडलपुर में मुनि संघो का निरंतर आगमन-- हुआ मंगल मिलनकुंडलपुर दमोह। सुप्रसिद्ध सिद्ध क्षेत्र जैन तीर्थ कुंडलपुर की पावन धरा पर मुनि संघो का निरंतर आगमन हो रहा है। शनिवार को संत शिरोमणि आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज के परम प्रभावक शिष्य पूज्य निर्यापक श्रमण मुनि श्री प्रसाद सागर जी महाराज एवं मुनि श्री अजितसागर जी महाराज ससंघ 5 मुनिराज, पूज्य मुनि श्री प्रयोगसागर जी महाराज ससंघ तीन मुनिराज, पूज्य मुनि श्री सौम्यसागर जी महाराज ससंघ 6 मुनिराज ,पूज्य मुनि श्री निर्दोष सागर जी मुनिराज ससंघ तीन मुनिराज का मंगल प्रवेश कुंडलपुर में हुआ ।इस अवसर पर कुंडलपुर में पूर्व से विराजित पूज्य निर्यापक श्रमण मुनि श्री अभयसागर जी महाराज, पूज्य निर्यापक श्रमण मुनि श्री संभव सागर जी महाराज ,मुनि श्री प्रभात सागर जी महाराज, मुनि श्री चंद्रसागर जी महाराज, मुनि श्री आनंदसागर जी महाराज, मुनि श्री निर्णयसागर जी ससंघ, मुनि श्री विनम्र सागर जी ससंघ, मुनि श्री विशदसागर जी ससंघ, मुनि श्री विराट सागर जी ससंघ, आर्यिकारत्न श्री ऋजुमति माताजी ससंघ ,आर्यिकारत्न श्री चिंतनमति माताजी ससंघ, आर्यिकारत्न श्री सोम्यमति माताजी ससंघ आदि का मंगल मिलन हुआ ।इस अवसर पर कुंडलपुर में बड़ी संख्या में उपस्थित यात्रीगण, ब्रह्मचारी भैया जी ,दीदी जी, कुंडलपुर क्षेत्र कमेटी पदाधिकारी सदस्य, महोत्सव समिति के संयोजक, सहसंयोजक ,प्रभारी सदस्य गण, कुंडलपुर जैन समाज आदि की उपस्थिति रही।