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: धराली की पुकार

Aditi News Team

Wed, Aug 6, 2025
धराली की पुकार ( धराली विनाश पर एक कविता - सुशील शर्मा)   चौतीस सेकंड बस इतना सा समय, खीरगंगा का प्रचंड अट्टहास और धराली का एक हिस्सा धरती पर से मिट गया। बादल, जो बरसने के लिए आते हैं, इस बार टूटकर गिरे, मानो आकाश ने अपना पूरा भार धरती पर फेंक दिया हो।   सड़कें चीख उठीं, घर तिनकों की तरह धार में बह गए, हँसते आँगन, बच्चों की किलकारियाँ, एक ही पल में मौन हो गईं।   कितने लोग बाजार देखने निकले थे, कितनों ने चाय की भाप में अपने सपनों को गरम किया होगा। किसी ने बेटी की शादी सोची होगी, किसी ने बेटे की पढ़ाई, किसी ने खेतों में अगली फसल का अनुमान लगाया होगा। और फिर बस चौतीस सेकंड, सब मलबे में दब गया।   यह मौत का तांडव था, जो अपने रास्ते में आए हर जीवन को निगलता चला गया। किसी की चीखें पत्थरों में दब गईं, किसी की सांसें पानी की धार में खो गईं। बचे हुए लोग अब ढूँढ रहे हैं कंधों पर उठाने को अपने प्रियजन, पर हाथ खाली लौट आते हैं।   धराली आज रो रही है न केवल उन मृतकों के लिए जो हमारे बीच नहीं रहे, बल्कि इस निर्मम सवाल के लिए भी कि आखिर क्यों? क्यों बार-बार पहाड़ की छाती चीर दी जाती है? क्यों जंगल काटे जाते हैं, नदियों को बाँधा जाता है, और पहाड़ों पर कंक्रीट के बोझ डाले जाते हैं?   यह हादसा सिर्फ बादल फटने का नहीं, यह हमारी लापरवाहियों का परिणाम है। हम भूल गए कि प्रकृति सिर्फ संसाधन नहीं, माँ है। और जब उसकी छाती पर इतना बोझ डालते हैं, तो वह कभी न कभी आक्रोश बनकर टूट पड़ती है।   धराली की आत्माएँ हमसे यही कह रही हैं हमारे जाने का शोक मनाओ, पर साथ ही प्रण लो, कि अब प्रकृति को और न सताओगे।   हमें चाहिए न सिर्फ राहत दल, बल्कि संवेदनशील नीतियाँ। हमें चाहिए जंगलों की रक्षा, नदियों की स्वच्छता, और पहाड़ों पर कंक्रीट नहीं, हरियाली का सहारा। हमें चाहिए सतर्कता की घंटियाँ, मौसम की सटीक चेतावनियाँ, और सबसे बढ़कर प्रकृति को माँ मानने का संस्कार।   धराली के मृत आत्माओं हम तुम्हें श्रद्धांजलि देते हैं। तुम्हारा दर्द हमारे कंधों पर रहेगा। तुम्हारी याद हमें बार-बार चेताएगी कि प्रकृति से खिलवाड़ का मूल्य कितना भारी होता है।   तुम्हारी आत्माएँ शांति पाएँ, और हम तुम्हारे अधूरे सपनों की कसम खाकर यह वचन दें कि धरती को फिर से उसकी लय में जीने देंगे।   धराली, तेरी चीखें हमारी आत्मा में गूँजेंगी जब तक हम सचमुच नहीं सीखते कि प्रकृति से संधि किए बिना मानव का भविष्य संभव नहीं।   सुशील शर्मा

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