संसार का राग-रंग और सुख-सुविधाएं स्थायी नहीं हैं, : मर्यादा जहां है, वहीं ब्रह्म है; तीर्थ का कष्ट सहें, शिकायत नहीं :मुनि समतासागर जी
Aditi News Team
Fri, Sep 25, 2026
मर्यादा जहां है, वहीं ब्रह्म है; तीर्थ का कष्ट सहें, शिकायत नहीं : मुनि समतासागर जी
कुण्डलपुर(म.प्र.)। दशलक्षण महापर्व के संस्कार शिविर के समापन अवसर पर निर्यापक श्रमण मुनि श्री समतासागर जी महाराज ने कहा कि धर्म का वास्तविक अर्थ पूजा-अनुष्ठान तक सीमित रहना नहीं, बल्कि जीवन में मर्यादा, संयम और आत्मनियंत्रण को उतारना है। मर्यादा जहां है,वहीं ब्रह्म है। उन्होंने कहा कि तीर्थयात्रा में आने वाली असुविधाओं को शिकायत का विषय बनाने के बजाय साधना का हिस्सा मानकर सहन करना चाहिए। तीर्थयात्रा का भाव सुविधा नहीं, धर्मलाभ और आत्मशुद्धि होना चाहिए।मुनि श्री ने कहा कि ब्रह्मचारी आश्रम से गृहस्थ जीवन में प्रवेश करने के बाद व्यक्ति की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है। उसे स्वयं के साथ परिवार को भी संस्कारों में संभालना होता है। खान-पान, पहनावे, बोलचाल और रहन-सहन में बढ़ती स्वच्छंदता पर उन्होंने कहा कि नियंत्रण समाप्त होने पर व्यक्ति धीरे-धीरे अमर्यादा की ओर बढ़ता है। इसलिए दशलक्षण धर्म के सिद्धांतों को केवल सुनना नहीं, बल्कि व्यवहार में उतारना आवश्यक है।
उन्होंने कहा कि संसार का राग-रंग और सुख-सुविधाएं स्थायी नहीं हैं। पुण्य के उदय में वैभव मिल सकता है, लेकिन कर्मों का उदय बदलते ही परिस्थितियां भी बदल जाती हैं। इसलिए विपरीत समय आने से पहले धर्म, दान, पूजा, नियम और संयम के संस्कार मजबूत कर लेने चाहिए। गृहस्थ को भगवान के दर्शन, पूजा-पाठ, दान और आत्मसंयम को अपनी नियमित दिनचर्या का हिस्सा बनाना चाहिए।मुनि श्री ने आहार की शुद्धता को विचारों की शुद्धता से जोड़ते हुए मांसाहार से बचने और ऐसे स्थानों से भी परहेज करने की प्रेरणा दी, जहां शाकाहार और मांसाहार दोनों बनाए जाते हों। फास्ट फूड सहित भोजन के प्रत्येक चयन में धार्मिक मर्यादा का ध्यान रखने की बात कही। सामाजिक समारोहों में भी सिद्धांतों से समझौता न करने की प्रेरणा देते हुए उन्होंने कहा कि अपनी धार्मिक मान्यताओं के अनुकूल भोजन न हो तो विनम्रता से उससे अलग रहना चाहिए।तीर्थयात्रा की कठिनाइयों का प्रसंग सुनाते हुए मुनि श्री ने साहित्यकार एकेश्वाल जी का उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि एक यात्रा में कुछ पढ़े-लिखे लोग पहाड़ी पर चढ़ते समय रास्ते और व्यवस्थाओं की कठिनाइयों की चर्चा कर रहे थे, जबकि पीछे एक वृद्ध महिला लाठी के सहारे चुपचाप चल रही थी। ऊपर पहुंचने पर उससे पूछा गया तो उसने सहजता से कहा—“तीर्थ यात्रा का कष्ट सहा जाता है, मुख से कहा नहीं जाता।” मुनि श्री ने कहा कि व्यवस्थाएं कितनी भी अच्छी हों, कुछ असुविधाएं रह सकती हैं। वास्तविक समस्या हो तो संबंधित व्यक्ति को शांत भाव से बताएं, लेकिन शिकायत को तीर्थयात्रा का विषय न बनाएं। उन्होंने शिविरार्थियों से कहा कि वे “शिविरार्थी बनकर आए हैं, शरणार्थी बनकर नहीं।” क्षेत्र कमेटी और कार्यकर्ताओं का दायित्व है कि वे बेहतर व्यवस्था दें, वहीं शिविरार्थियों को भी सुविधाओं की अपेक्षा के बजाय समायोजन और संतोष की शक्ति विकसित करनी चाहिए।मुनि श्री ने कहा कि संस्कार शिविर की वास्तविक उपलब्धि यहां से मिलने वाली नियम-संयम की पूंजी है। किसी ने वर्षभर, किसी ने दो वर्ष और किसी ने आजीवन के संकल्प लिए हैं। उन्होंने अगले वर्ष अनंत चतुर्दशी के दिन यात्रा न कर पूरा दिन-रात शिविर में रहकर उपवास और साधना करने तथा अगले दिन स्वल्पाहार, अभिषेक-पूजन और क्षमावाणी के बाद प्रस्थान करने की प्रेरणा दी। दमोह गौरव क्षुल्लक श्री स्वस्तिक सागर जी महाराज एवं ऐलक श्री निश्चयसागर जी महाराज ने भी संबोधित किया। भगवान वांसुपूज्य जी के मोक्ष कल्याणक महोत्सव पर निर्वाण लाडू अर्पित किया गया। पूर्व विधायक सुनील जैन श्रीमती निधि जैन ने मुनिसंघ का आशीर्वाद प्राप्त किया। प्रवक्ता अविनाश जैन ‘विद्यावाणी’ एवं क्षेत्र के प्रचारमंत्री जयकुमार जैन ‘जलज’ ने बताया कि लगभग 1600 श्रद्धालुओं ने धार्मिक अनुष्ठानों के साथ नियम-संयम और जीवन को संस्कारित करने की प्रेरणा ग्रहण की। इसकी सार्थकता तभी होगी, जब यहां मिले संस्कारों को श्रद्धालु पूरे वर्ष अपने जीवन में उतारेंगे।उन्होंने बताया कि दोपहर में परंपरानुसार गाजे-बाजे के साथ श्रीजी की शोभायात्रा निकाली गई जो कुण्डलपुर नगर भ्रमण करते हुए शिविर पंडाल में पहुंची जहां धार्मिक आयोजन के साथ तत्त्वार्थ सूत्र वाचन हुआ तथा छोटे बच्चों को जैनत्व संस्कार विधि कार्यक्रम संपन्न हुआ। सभी कार्यकर्ताओं एवं श्रावक श्रैष्ठियों का सम्मान हुआ।
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अदिति न्यूज,(सतीश लमानिया)
मुनि समतासागर जी